NatWest Series 2002 Final: A Glorious Indian Victory.

314/8, लक्ष्य अभी भी 12 रन दूर, 13 गेंदें शेष। 18 वर्ष पूर्व जब आप ये मैच देख रहे थे तो क्या सोच रहे थे ? क्या ये भारत की लगातार 10वीं हार हो जाएगी फाइनल में या कैफ और ज़हीर ये 12 रन बनाकर इतिहास रच देंगे ?

चलते हैं कुछ घण्टे पीछे। इंग्लिश कप्तान नासिर हुसैन ने लॉर्ड्स के बढ़िया बैटिंग विकेट पर टॉस जीता और किसी को कोई संदेह नहीं था कि वो क्या निर्णय लेंगे। Nick Knight का विकेट जल्दी गिर जाने के बाद इस Natwest सीरीज के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज रहे Marcus Trescothik ने कप्तान नासिर के साथ मिलकर 185 रनों की साझेदारी की। Trescothik ने 100 गेंदों में 109 रन बनाए। कप्तान नासिर ने भी 115 रनों की पारी खेली। अंत में Andrew Flintoff के तेजतर्रार 40 रनों के साथ 50 ओवरों के बाद इंग्लैंड का स्कोर था 325/5.

भारतीय टीम रन चेज के लिए वो भी फाइनल में बड़े रन चेज के लिए बिल्कुल नहीं जानी जाती थी। पिछले 9 फाइनल जो भारतीय टीम ने हारे, उनमें से 5 रन चेज करते हुए हारे थे।

टीम के ओपनर वीरेंद्र सेहवाग ने इस सीरीज में 6 पारियों में अबतक 184 रन बनाए थे। दूसरे ओपनर कप्तान सौरव गांगुली की फॉर्म और ज्यादा खराब थी। उन्होंने अपनी 6 पारियों में मात्र 89 रन बनाए थे। पिछली सात पारियों में उन्होंने केवल दो बार दहाई का आँकड़ा पार किया था, उनके अबतक के स्कोर थे- 43, 7, 0, 24, 6, 9. सबके मन में यही प्रश्न था, क्या आज वो चलेंगे ?

तीसरे ओवर में डैरेन गॉफ़ की 5वीं गेंद पर सौरव ने अपनी पारी का पहला चौका लगाया। अगले ओवर में उन्होंने रूम बनाकर Alex Tudor की गेंद को कवर बाउंड्री की ओर भेज दिया। इस शॉट से लगा कि शायद आज सौरव गांगुली इस सीरीज में अपनी खराब फॉर्म से मुक्ति से पा चुके हैं। गांगुली ने अपने अद्भुत ऑफ साइड के स्ट्रोक प्ले का प्रदर्शन शुरू कर दिया था, 7 ओवर में भारत के 50 रन पूरे हुए। गांगुली 21 में 31 और सेहवाग 28 में 15 पर थे। आमतौर पर ये आँकड़ें उल्टे होते थे, पर आज सौरव गांगुली अलग ही फॉर्म में थे। Andrew Flintoff के पहले ही ओवर में उन्होंने आगे निकलकर कवर में चौका लगाया, दो गेंद बाद उन्होंने रूम बनाया और इस बार फ्लिंटॉफ की शॉर्टपिच गेंद को कवर पॉइंट के ऊपर से छक्के के लिए भेज दिया। अपने अगले ओवर में फ्लिंटॉफ अराउंड द विकेट से आए, ऑफ स्टंप के बाहर ओवरपिच गेंद, गांगुली ने इसे पुनः उठा दिया, कवर के ऊपर से One Bounce Four, इस ओवर में अपने अगले चौके से सौरव गांगुली ने 35 गेंदों में इस Natwest सीरीज में अपना पहला अर्धशतक पूरा किया।

वीरेंद्र सेहवाग अपने कप्तान को ऐसी बल्लेबाजी करते देख कितने समय तक शांत रह सकते थे ! कप्तान ने उनसे कहा था कि शुरुआत अच्छी मिल गयी है आउट नहीं होना है। पारी के 12वें ओवर में सेहवाग ने रॉनी ईरानी की पहली गेंद को मिड ऑन और मिडविकेट के बीच से उठाकर चौका लगा दिया। कप्तान उनके पास गए और बोले, “देख वीरू, पहली गेंद पर चौका आ गया है, सिंगल सिंगल खेलता रहियो, आठ नौ आ जाएंगे ओवर में।” वीरू ने कहा “नो प्रॉब्लम”, पर वो कहाँ माननेवाले थे, उन्होंने अगली गेंद पर फिर चौका लगा दिया, इस बार पॉइंट और थर्डमैन पर खड़े फील्डरों के बीच से। कप्तान फिर उनके पास गए और बोले, “देख वीरू, अब तो दो चौके आ गए हैं, अब सिंगल लेंगे।” वीरू ने फिर “हाँ हाँ, नो प्रॉब्लम” कहा और अगली गेंद पर स्वीप किया, फिर से चौका। ये गेंद अगर बल्ले पर न लगती तो ये पक्का LBW होना था। कप्तान ने थोड़ा गरियाया और ये ढिठाई देखकर कहा, “देख अगर तू आउट हो गया न तो इस तरफ (पवेलियन की ओर) मत जाइयो, उस तरफ से सीधा होटल चले जाइयो।” सेहवाग ने इसी ओवर की पाँचवी गेंद पर ऑफ साइड की ओर ज़ाक़र गेंद को लेग साइड में मोड़ दिया, एक और चौका। इस बार कप्तान सौरव दूसरी ओर गए ही नहीं समझाने, वे जान गए थे कि ये हाँ हाँ कर देगा पर मानेगा नहीं। ये सारी बातें सौरव गांगुली ने “आजतक” चैनल के एक कार्यक्रम में कहीं।

वीरेन्द्र सेहवाग के इस आक्रमण के बाद स्कोर 13 ओवर में 98/0 हो चुका था। अगले ओवर में फ्लिंटॉफ की पहली गेंद पर कप्तान के चौके के साथ स्कोर 100 के पार हो चुका था और इस रन चेज के लिए बहुत अच्छा प्लैटफॉर्म सेट था। लेकिन भारतीय रन चेज इतनी आसान कहाँ होती थी ! 106 रन की साझेदारी के बाद 15वें ओवर में सौरव गांगुली एक बड़ा शॉट लगाने के प्रयास में Alex Tudor की गेंद पर बोल्ड हो गए। 43 गेंदों में 60 की इस पारी में उन्होंने 50 रन बाउंड्री से बनाए थे, 10 चौके और एक छक्का।

भारत का चिर परिचित Batting Collapse आरम्भ हो चुका था। अगले ओवर में Ashley Giles की गेंद वीरेंद्र सेहवाग के बैट को छोड़ते हुए ऑफ स्टंप पर लगी। 19वें ओवर में दिनेश मोंगिया और 21वें ओवर में राहुल द्रविड़ के आउट होने के साथ स्कोर 21 ओवर में 133 पर 4 हो गया। ओपनिंग साझेदारी द्वारा बनाया गया प्लैटफॉर्म बर्बाद होता दिख रहा था।

स्कोर 146 पर 4, 24वें ओवर की आखिरी गेंद, लेफ्ट आर्म स्पिनर Ashley Giles की इस गेंद को रूम बनाकर खेलने के प्रयास में सचिन तेंदुलकर बोल्ड हो गए। इस पूरी सीरीज में भारत के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज रहे सचिन का विकेट मिलते इंग्लिश खिलाड़ियों का जश्न ऐसा था मानो वो मैच जीत चुके हैं। सौरव ने बाद में कहा 146 पर 5 होने और सचिन के पवेलियन लौटने के बाद वे स्वयं को कोस रहे थे कि क्यों उन्होंने इंग्लैंड को 300 से ज्यादा रन बनाने दिए।

106/0 से 146 पर 5.भारतीय टीम ने 40 रन में अपने 5 विकेट गँवा दिए थे। युवराज सिंह और मोहम्मद कैफ, 21 और 22 साल के ये दो युवा खिलाड़ी इस समय मैदान में पिच पर एक साथ थे। अधिकांश भारतीय दर्शक भारतीय टीम के पुराने ट्रैक रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए मैच जीतने की आशा छोड़ चुके थे। युवराज ने कुछ समय पूर्व “आजतक” के विक्रांत गुप्ता से Instagram चैट के दौरान बताया कि स्टेडियम में से भारतीय दर्शकों ने धीरे धीरे निकलना शुरू कर दिया था।

कैफ और युवराज ने पारी को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। एक-एक, दो-दो रन के साथ बीच बीच में चौके भी आ रहे थे। 33वें ओवर में दोनों के बीच पचास रनों की साझेदारी पूरी हुई। 34वें ओवर में युवराज सिंह ने Ashley Giles की गेंद पर एक लॉफ्टेड स्वीप खेला और अपनी पारी का पहला छक्का लगाया, इसके साथ टीम के 200 रन भी पूरे हो गए।

भारतीय टीम को अब 16 ओवरों में 121 रन चाहिए थे। युवराज सिंह के बल्ले से अब लगातार चौके आने शुरू हो गए थे। 38वें ओवर में Andrew Flintoff की गेंदों पर युवराज ने चौकों की हैट्रिक लगा दी। एक समय 40 गेंद में 30 रन पर खेल रहे युवराज ने अगली 15 गेंदों में 28 रन बना दिए थे। अब भारत को 12 ओवरों में 89 रन चाहिए थे।

Lockdown के दौरान कैफ और युवराज के बीच हुई Instagram चैट में युवराज ने बताया कि इस समय बालकनी में खड़े दादा ने (युवराज की फॉर्म को देखते हुए) कैफ को सिंगल खेलकर युवराज को स्ट्राइक देने का संकेत किया। कैफ को जो अगली गेंद मिली, वो शॉर्ट थी, 81.6 मील प्रति घण्टे की गति से फेंकी गई इस गेंद को कैफ ने मिडविकेट के ऊपर से पुल कर दिया, गेंद दर्शक दीर्घा में गिरी, और कैफ ने युवराज से कहा, “हम भी खेलने आए हैं।”

40 ओवर में भारत का स्कोर हो गया था 258/5, कैफ और युवराज के बीच शतकीय साझेदारी थोड़ी देर पहले ही पूरी हुई थी। आखिरी 10 ओवरों में 69 रनों की आवश्यकता, अब जीत निकट दिखाई पड़ने लगी थी। 42वें ओवर पॉल कॉलिंगवुड की गेंद पर सिंगल के साथ कैफ ने 50 गेंदों में अपने 50 रन पूरे कर लिए।

अब समय आ गया था खेल में एक और टर्निंग पॉइंट का। पॉल कॉलिंगवुड के इसी ओवर की चौथी गेंद पर फाइनल लेग पर पैडल करने के प्रयास में युवराज के बल्ले का टॉप एज लेकर गेंद हवा में उठ गई और सर्कल में फाइनल लेग पर खड़े Alex Tudor ने कैच पलड़ा लिया। इसी के साथ युवराज और कैफ के बीच 17.4 ओवर में हुई 121 रनों की साझेदारी का अंत हुआ। युवराज ने 63 गेंदों में 69 रन बनाए थे।

युवराज के विकेट के बाद अबतक सहायक भूमिका निभा रहे कैफ ने Steering अपने हाथ में लिया, कैफ ने अगली 22 गेंदों में 30 रन बना दिए और हरभजन के साथ 47 रनों की साझेदारी की।

46वें ओवर में डैरेन गॉफ़ को 11 रन पड़ने के बाद भारत को 3 ओवरों में 14 रन की आवश्यकता थी और लगने लगा था कि आज फाइनल्स में हार का क्रम टूट जाएगा, पर क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल यूँ ही नहीं है, जहाँ आप सोचते हैं, गेम खत्म है, वहीं गेम अचानक बदलकर आपको चौंका देता है। यहाँ भी यही हुआ, इंग्लैंड के स्टार ऑलराउंडर Andrew Flintoff ने 47वें ओवर में पहली 5 गेंदों में पहले हरभजन और फिर कुम्बले का विकेट लेकर इंग्लैंड की पकड़ पुनः मजबूत कर दी।

आखिरी दो ओवर में 11 रनों की आवश्यकता। 49वें ओवर में कैफ और ज़हीर ने पहली पाँच गेंदों पर भागकर 5 रन लिए, आखिरी गेंद कैफ के बल्ले का किनारा लेकर विकेटकीपर के पास से चौके के लिए चली गई। 50वें ओवर में मात्र 2 रन चाहिए थे। यह ओवर फ्लिंटॉफ कर रहे थे। ज़हीर खान स्ट्राइक पर, पहली दो गेंदें डॉट रहीं। तीसरी गेंद को जहीर ने बहुत हल्के से खेला और रन के लिए भाग पड़े। कवर के फील्डर ने गेंद को पकड़ा, Striker End पर थ्रो किया, कैफ ने डाइव लगाई, गेंद विकेट पर नहीं लगी और थर्डमैन की ओर गई, स्कोर बराबर पर ओवरथ्रो में रन भागने का अवसर, कैफ फिर से उठ खड़े हुए और दूसरे रन के लिए भागे, Non-Striker End पर आने से पहले उन्हें पता चल चुका कि अब भारतीय टीम यह मैच जीत चुकी है, वे क्रीज में आने से पहले अपनी मुट्ठी हवा में लहराते आ रहे थे।

लॉर्ड्स की बालकनी में कप्तान सौरव गांगुली भी अपनी नीली जर्सी लहरा रहे थे। (आज वो इसे अपनी गलती मानते हैं) भारत ने 325 का विशाल स्कोर चेज कर लिया था और पिछले 9 फाइनल में लगातार हारने का क्रम तोड़ दिया था। 75 गेंदों में 87 नॉट आउट रन बनाने वाले कैफ मैन ऑफ़ द मैच हुए।

“When Virender Sehwag’s disorderly magnificence flipped the game on its head.”

26/11 के बाद अपना भारतीय टूर बीच में छोड़कर जाने वाली इंग्लैंड टीम 11 दिसम्बर 2008 को चेन्नई में पहला टेस्ट मैच खेल रही थी।

इंग्लैंड के दोनों ओपनर्स Andrew Strauss और Alastair Cook (दोनों अब Sir हो चुके हैं) ने पहले विकेट के लिए 118 रनों की साझेदारी की। Andrew Strauss ने शतक (118) बनाया और इंग्लैंड की टीम ने अपनी पहली पारी 316 रन पर समाप्त की। हरभजन सिंह और अमित मिश्र को 3-3 विकेट मिले।

भारतीय बल्लेबाजी की शुरुआत बेहद खराब रही, वीरेंद्र सेहवाग 9, गौतम गंभीर 19 और राहुल द्रविड़ मात्र 3 रन बनाकर आउट हो गए। 37 रन पर। 44वें ओवर में भारतीय टीम ने 137 रन पर छठा विकेट खो दिया। कप्तान MS धोनी और हरभजन सिंह के बीच 75 रनों की साझेदारी ने स्कोर को 212 तक पहुँचाया। धोनी (53) इस पारी में 50 पार करने वाले अकेले बल्लेबाज रहे और टीम 241 पर ऑल आउट हो गई।

पहली पारी में 75 रन की अच्छी लीड के साथ दूसरी पारी खेलने उतरी इंग्लैंड की शुरुआत भी खराब रही और पहले तीन विकेट मात्र 43 रन पर गिर गए पर यहाँ से चौथे विकेट के लिए 214 रनों की साझेदारी हुई, पहली पारी के शतकवीर Andrew Strauss और Paul Collingwood के बीच। दोनों ने शतक लगाए।

311/9 के स्कोर पर 386 की लीड के साथ इंग्लिश कप्तान Kevin Pietersen ने पारी घोषित कर दी और भारत को चार सेशन में 387 का विशाल लक्ष्य चेज करने को मिला।

अधिकांश टीमें यहाँ क्या करतीं ? अधिकांश बल्लेबाज क्या करते ? ड्रॉ के लिए खेलते, पर भारतीय टीम के विस्फोटक ओपनर वीरेंद्र सेहवाग के विचार कुछ अलग थे। सेहवाग यहाँ मैच जीतने के लिए खेल रहे थे, ड्रॉ के लिए नहीं। कोई ऐसा न समझे कि ऐसी स्थिति में ड्रॉ के लिए खेलना गलत या कायरता है, बात बस यह है कि वीरेंद्र सेहवाग को विश्वास था कि यह लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।

पारी के दूसरे ओवर में जेम्स ऐंडरसन की चौथी गेंद पर सेहवाग ने बल्ले का मुँह खोला और गेंद को Gully के पास से चार रनों के लिए भेजकर अपना खाता खोला। जेम्स ऐंडरसन की अगली गेंद, शॉर्ट, ऑफ स्टम्प के बाहर, “Hammered”. शरीर का सारा भार सेहवाग ने बैकफुट पर डाला और गेंद को पॉइंट बाउंड्री के बाहर भेज दिया। पहली पाँच गेंदों में 2 चौके लगाकर सेहवाग ने दो-दो संदेश दे दिए थे, एक अपने ड्रेसिंग रूम के लिए और एक इंग्लिश टीम के लिए। अगले ओवर में Stephen Harmison के ओवर में भी दो चौके लगे और स्कोर हो गया 3 ओवर में 25/0.

Stephen Harmison फिर से पारी का 5वाँ ओवर लेकर आए। पहली ही गेंद पर सेहवाग ने मिड ऑन से बगल से गेंद को ड्राइव कर दिया, 5वीं गेंद को गली में खेलने के प्रयास में उन्हें एक जीवनदान मिला जब उनका शॉट Alastair Cook की उंगलियों को छूता हुआ निकल गया, जिन्होंने कैच के लिए जाने में थोड़ी सी देर कर दी थी। ऐसे जीवनदान के बाद आमतौर पर बल्लेबाज थोड़े अधिक सावधान हो जाते हैं, विकेट की कीमत बढ़ा देते हैं, पर सेहवाग तो मानो कह रहे थे, “हमको घण्टा फर्क नहीं पड़ता”. (इसी ऐटिट्यूड से उन्होंने करियर में बहुत बार विकेट भी फेंका है पर इस पारी में वे सफल रहे।) Harmison की अगली गेंद फिर से शॉर्ट, ऑफ स्टम्प के बाहर, सेहवाग का Upper Cut, बैकवर्ड पॉइंट बाउंड्री के ऊपर से 6 रन. 5 ओवर के बाद टीम का स्कोर हो चुका था 5 ओवर में 45/0. सेहवाग 20 गेंद में 36 पर खेल रहे थे और Stephen Harmison के पहले 3 ओवर में 28 रन आ चुके थे।

इंग्लिश कप्तान केविन पीटरसन ने गेंदबाजी में परिवर्तन करते हुए 6ठे ओवर में ही मोंटी पैनेसर को लगाया। ओवर की तीसरी गेंद पर सेहवाग को स्ट्राइक मिली, मोंटी ने अराउंड द विकेट से “आ बैल मुझे मार” का आचरण करते हुए लेग स्टंप पर फुलटॉस फेंक दी, सेहवाग ने इस Juicy Full-Toss को बड़े प्रेम से स्वीकार करते हुए मिडविकेट बाउंड्री के बाहर स्टैंड में भेज दिया और इसी छक्के के साथ भारत की पारी के 50 रन पूरे हो गए। शुरुआती 54 में से 42 रन वीरेंद्र सेहवाग के थे। दसवें ओवर की पहली गेंद पर एक रन के साथ सेहवाग ने 32 गेंदों में अपने 50 रन पूरे किए। कपिल देव का 1982-83 में पाकिस्तान के विरुद्ध बनाया गया भारत के लिए सबसे तेज टेस्ट अर्धशतक (30 गेंदों में) का रिकॉर्ड बच गया था।

12वें ओवर में मोंटी की पहली गेंद पर चौका लगाने के बाद सेहवाग ने अगली गेंद पर एक टांग बाहर निकाली, गेंद की पिच तक गए और उसे लॉन्ग ऑन बाउंड्री के पार फिर से 6 रनों के लिए भेज दिया। 18वें ओवर में फ्लिंटॉफ की गेंद पर सेहवाग के चौके के साथ भारत के 100 रन पूरे हो गए, जिसमें से 73 सेहवाग के थे।

जैसे जैसे दिन का खेल समाप्त होने का समय आ रहा था, सेहवाग और गंभीर ने एकग्रता बढ़ा दी थी, लेकिन 23वें ओवर में Graeme Swann की एक आगे फेंकी हुई गेंद, ऑफ स्टम्प की लाइन के बाहर, सेहवाग ने फिर से एक पैर बाहर निकाला और इस गेंद को मिडविकेट बाउंड्री के पार स्टैंड्स में पहुँचा दिया। 3 फील्डर डीप में थे, पर सेहवाग को फर्क नहीं पड़ा। यह उनकी पारी का चौथा छक्का था। टीम का स्कोर हो चुका था 117 रन बिना किसी विकेट के। Swann के ओवर की आखिरी गेंद को उन्होंने फाइन लेग की ओर खेलकर सिंगल लेना चाहा, इस बार गेंद और बल्ले के बीच कोई संपर्क नहीं हुआ, गेंद पैड पर लगी, इंग्लैंड के सारे खिलाड़ी एक साथ चिल्ला उठे, “How’s that ?” अंपायर रॉजर हार्पर की उंगली उठी और वीरेंद्र सेहवाग की तूफानी पारी अंत हुआ। आउट होने से पूर्व उन्होंने एक ऐसे मैच में भारतीय टीम को विजय की ओर अग्रसर कर दिया था, जिसमें टीम ड्रॉ के साथ भी संतुष्ट रह सकती थी।

शाम के 5 बजे जब दिन का खेल समाप्त हुआ तो स्कोर था 29 ओवर में 131/1. गौतम गम्भीर 41 और राहुल द्रविड़ 2 पर टिके हुए थे। शुरुआती 3 दिनों में जहाँ भारत की जीत के कोई आसार नहीं थे, चौथे दिन की शाम तक वीरेंद्र सेहवाग की पारी के कारण न सिर्फ जीत की उम्मीदें जाग चुकी थीं, बल्कि भारत का पलड़ा थोड़ा सा भारी हो चुका था। “The Guardian” अखबार ने लिखा था, “Sehwag’s blitz threatens England’s impregnable position.”

पाँचवें दिन भारत को 256 रनों की आवश्यकता थी और 9 विकेट हाथ में थे। भारत ने राहुल द्रविड़ का विकेट सस्ते में खो दिया, गंभीर चौथे दिन की शाम के अपने व्यक्तिगत स्कोर में 25 रन जोड़कर आउट हो गए। लंच तक भारत का स्कोर हो गया था, 53 ओवर में 213 पर 3. अगले दो सेशन में 174 रनों की आवश्यकता। सचिन 27 और लक्ष्मण 20 पर खेल रहे थे। दूसरे सत्र के चौथे ही ओवर में VVS लक्ष्मण Graeme Swann की गेंद पर फॉरवर्ड शॉर्ट लेग पर कैच दे बैठे। स्कोर था 224/4, अब इंग्लैंड को अपनी वापसी की उम्मीदें साफ दिखने लगी थीं, इस समय एक और विकेट गिरना मैच में इंग्लैंड का पलड़ा भारी कर देता पर टेस्ट टीम में वापसी कर रहे युवराज सिंह ने यहाँ 87 रन की पारी खेली और पाँचवें विकेट के लिए सचिन तेंदुलकर के साथ 163 रनों की साझेदारी की। पारी के 99वें ओवर में सचिन ने Graeme Swann की गेंद पर स्वीप शॉट खेलकर दो दो कार्य सम्पन्न किए, टीम की जीत के लिए आवश्यक 4 रन भी पूरे हुए और उनका 41वाँ शतक भी। यह पारी सचिन के करियर की सर्वश्रेष्ठ पारियों में से एक थी। इसके बाद भी मैन ऑफ द मैच का पुरस्कार उन्हें नहीं बल्कि वीरेंद्र सेहवाग को मिला क्योंकि सेहवाग की पारी ने ही इस मैच में भारत की जीत की संभावना बनाई, उनकी इस पारी के बिना मैच में दो परिणाम सम्भव थे, या तो ड्रॉ या इंग्लैंड की जीत।

1976 में पोर्ट ऑफ स्पेन में वेस्ट इंडीज़ के विरुद्ध 4 विकेट पर 403 चेज करने के बाद यह टेस्ट मैचों में भारत की सबसे बड़ी रन चेज थी। उस जीत की तरह यह जीत भी एक सामूहिक प्रयास का परिणाम थी, और इसके सबसे बड़े नायक वीरेंद्र सेहवाग थे।

कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने कहा, “Sehwag was the play maker and without him we would have been defending this match.”

The Godfather of Indian Batsmanship.

सितम्बर 1979. ओवल में खेले जा रहे चौथे टेस्ट में भारत के सामने लक्ष्य था 438 रनों का। भारतीय टीम इस सीरीज में 0-1 से पीछे चल रही थी।

यह सुनील गावस्कर के करियर का 50वाँ टेस्ट था। इस रन चेज शुरु होने से पूर्व अबतक इस सीरीज में गावस्कर के स्कोर थे 61, 68, 42, 59, 78 और 13. चौथे दिन का खेल खत्म होने तक भारत ने बिना कोई विकेट गँवाए 76 रन बना लिए, गावस्कर 42 और चेतन चौहान 32 पर खेल रहे थे।

आखिरी दिन भारतीय टीम को 362 रनों की आवश्यकता थी, अर्थात एक रन प्रति मिनट। पाँचवें दिन के पहले सत्र में दोनों ओपनर्स ने बहुत संभलकर बल्लेबाजी की, लंच तक भारत का स्कोर था 169/0. लंच के बाद अगले एक घण्टे में भी बल्लेबाजी धीमी ही रही और स्कोर हुआ 213/0. अभी तक यह मैच एक बोरिंग ड्रॉ की ओर बढ़ता दिखाई पड़ रहा था। चेतन चौहान ड्रिंक्स ब्रेक के तुरंत बाद 80 रन के स्कोर पर बॉब विलिस को गेंद पर आउट हो गए। नम्बर 3 पर गावस्कर का साथ देने आए दिलीप वेंगसरकर। अगले एक घण्टे में सुनील गावस्कर ने गियर बदला और चायकाल तक स्कोर हो गया 304 रन पर 1 विकेट। गावस्कर रिस्क लिए बिना भी आक्रामक बल्लेबाजी कर रहे थे। अचानक से 438 रनों का लक्ष्य सम्भव लगने लगा था। 4 साल पहले 1975 विश्वकप में एक वन डे मैच में पूरे 60 ओवर टिककर मात्र 60 रन बनाने वाले सुनील गावस्कर का यह रूप सबको भा रहा था। वे अब अपनी फ्लॉपी हैट उतारकर खेल रहे थे।

आखिरी सत्र में भारत को जीत के लिए 134 रनों की आवश्यकता थी। स्थिति को देखते हुए इंग्लिश कप्तान Michael Brearley ने अपने गेंदबाजों से ओवर रेट धीमी कर देने को कहा। चाय के अगले आधे घण्टे में इंग्लिश गेंदबाजों ने मात्र 6 ओवर फेंके।

सुनील गावस्कर ने अपना दोहरा शतक पूरा किया, स्कोर हो चुका था 366 पर 1, अगले 12 ओवरों में 76 रन चाहिए थे। इसी समय दिलीप वेंगसरकर 52 रन बनाकर आउट हो गए। 6 से ऊपर की आवश्यक रन गति को देखकर कप्तान श्रीनिवास वेंकटराघवन ने यहाँ नम्बर 4 पर अनुभवी और फॉर्म में चल रहे गुंडप्पा विश्वनाथ को भेजने की बजाय युवा कपिल देव को भेज दिया। ( विश्वनाथ ने पिछले टेस्ट में शतक लगाया था और इसी मैच की पहली पारी में 62 रन बनाए थे।) तीन साल पहले पोर्ट ऑफ स्पेन में जब भारत ने 403 रनों का लक्ष्य प्राप्त किया था तो गावस्कर और विश्वनाथ दोनों ने शतक बनाए थे। कप्तान वेंकट का यह प्रयोग असफल रहा और कपिल 0 पर आउट हो गए। कपिल के आउट होने पर भी विश्वनाथ की बजाए यशपाल शर्मा क्रीज पर आए।

389 रन के स्कोर पर सुनील गावस्कर के रूप में भारत का चौथा विकेट गिरा। 8 घण्टे तक बल्लेबाजी करके 221 रन बनाकर वे टीम को विजय के द्वार तक ले जा चुके थे। उनके आउट होने के बाद टीम को अगली 46 गेंदों में 49 रनों की आवश्यकता थी, पर टीम विजय से मात्र 9 रन दूर रह गई। फाइनल स्कोर रहा 429/8. सुनील गावस्कर की यह पारी टेस्ट क्रिकेट में रन चेज में खेली गई सर्वश्रेष्ठ पारियों में से एक मानी जाती है।

इस पारी के बाद वे रेटिंग में 900 से अधिक पॉइंट प्राप्त करने वाले वे भारत के पहले बल्लेबाज बन गए। भारतीय बल्लेबाजों में उनके बाद यह उपलब्धि 4 दशक बाद विराट कोहली ने प्राप्त की।

बैंगलोर 1987. भारत बनाम पाकिस्तान सीरीज का 5वाँ और सुनील गावस्कर के करियर का आख़िरी टेस्ट। यह एक टर्निंग पिच थी। चौथी पारी में भारत के सामने लक्ष्य था 221 रन का। अपने करियर में आखिरी बार बल्लेबाजी कर रहे गावस्कर ने अकेले दम पर भारत की उम्मीदें जीवित रखीं। भारत के पहले दो विकेट 15 पर गिर जाने के बाद उन्होंने दिलीप वेंगसरकर के साथ 49 और फिर पाँचवें विकेट के लिए युवा अज़हर के साथ 43 और 6ठे विकेट के लिए रॉजर बिनी के साथ 32 रन जोड़े। लेकिन उनके अलावा कोई भी बल्लेबाज बताने योग्य योगदान न दे पाया। टीम का स्कोर 180 पर 7, सुनील गावस्कर 96 पर खेल रहे थे, अपने करियर की आखिरी पारी में वे टीम को जीत दिलाने की ओर बढ़ रहे थे पर उनकी किस्मत में आखिरी टेस्ट में न जीत लिखी न शतक। 180 के स्कोर पर वह 8वें विकेट के रूप में इकबाल कासिम की गेंद पर आउट हुए और टीम 204 पर ऑल आउट हो गई। सुनील गावस्कर की यह पारी भी उनकी यादगार पारियों में से एक है।

टेस्ट मैच की चौथी पारी में सुनील गावस्कर के नाम एक बेहद शानदार रिकॉर्ड है। उन्होंने 33 पारियों में 4 शतक और 8 अर्धशतक के साथ 58.25 की औसत से 1398 बनाए हैं। कोई भी भारतीय बल्लेबाज इस रिकॉर्ड में आसपास भी नहीं। ओवल में 221 और बैंगलोर में 96 रन की पारी के अतिरिक्त उन्होंने अपनी डेब्यु सीरीज में ही 1971 Barbados टेस्ट में 117 रन बनाकर टीम को 103 ओवर खेलकर मैच बचाने में योगदान दिया। वे ओपन करने आए थे और अंत तक टिके रहे। अप्रैल 1976 में ऐतिहासिक पोर्ट ऑफ स्पेन टेस्ट में उन्होंने 403 की सफल रन चेज में 102 रन बनाए। 1986 में ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध चेन्नई में टाई हुए टेस्ट में 348 के चेज में 90 रन बनाए थे।

सुनील गावस्कर सही अर्थों में भारतीय बैटिंग के Godfather हैं। उन्होंने एक पूरी जेनरेशन को प्रेरित किया। टेस्ट क्रिकेट में 30 शतक और 10 हज़ार रन बनाने वाले वे पहले बल्लेबाज हुए। उन्होंने अपने पहले 1 हज़ार रन मात्र 6 टेस्ट में पूरे कर लिए थे। डेब्यु सीरीज में ही 4 टेस्ट में बनाए गए उनके 774 रन आज भी विश्व के किसी भी बल्लेबाज द्वारा डेब्यु टेस्ट सीरीज में बनाए गए सर्वाधिक रन हैं। उन्होंने दो बार एक टेस्ट सीरीज में सात सौ से अधिक रन बनाए हैं, उनके अतिरिक्त किसी भी भारतीय बल्लेबाज ने एक बार भी नहीं।

क्रिकेट इतिहास के महानतम बल्लेबाजों में से एक सुनील गावस्कर को जन्मदिन की शुभकामनाएँ।

“Magnificent Mahendra. He’s unbelievable in so many ways.”

“Twenty nine for five and the skipper comes out. He must have known he’s lost a big toss there. But wouldn’t have expected to be batting inside the first 10 overs.” चेन्नई में दिसम्बर 2012 में हुए भारत- पाकिस्तान मैच के दौरान कही गई कॉमेंटेटर रवि शास्त्री की पहली लाइन और अगले 40 ओवर भारतीय क्रिकेट में महेंद्र सिंह धोनी का महत्व दर्शाते हैं। अपने करियर में टीम को कई बार संकट से उबारने वाले कप्तान ने इस मैच में भी दसवें ओवर में मात्र 29 रन पर 5 विकेट गिर जाने के बाद आकर 125 गेंदों में 113 नाबाद रन बनाए और टीम को 227 तक पहुँचाया।

2005 में राहुल द्रविड़ के कप्तान बनने के बाद भारतीय टीम रन चेज में एक बेहतरीन टीम बनकर उभरी। पूर्व कप्तान सौरव गांगुली के कार्यकाल में अनेक सफलताओं के बाद भी जहाँ रन चेज में भारत का रिकॉर्ड 23-37 (23 विजय और 37 पराजय) था, वहीं राहुल द्रविड़ के समय यह रिकॉर्ड 23-14 हो गया। इस दौरान भारतीय टीम ने लगातार 15 रन चेज में विजय पाई। इसके सबसे बड़े कारणों में से एक था टीम में महेंद्र सिंह धोनी का होना। इन 15 मैचों की दस पारियों में धोनी ने 3, 4, 5, 6 हर नम्बर पर बल्लेबाजी की और 134 की एवरेज एवं 113 की स्ट्राइक रेट से 537 रन बनाए। राहुल द्रविड़ के कार्यकाल में ही महेंद्र सिंह धोनी एक नैचुरल बॉल स्ट्राइकर होने के साथ साथ एक भरोसेमंद बल्लेबाज के रूप में उभरकर सामने आए। जो जल्दी विकेट गिर जाने पर स्थिति सम्भाल सकता था और अंतिम ओवरों में तेज रन बना सकता था।

रन चेज में महेंद्र सिंह धोनी की क्षमताओं का पहला परिचय 31 अक्टूबर 2005 को जयपुर के सवाई मानसिंह स्टेडियम में मिला। कुमार संगाकारा के 139 नॉटआउट के बलपर श्रीलंका ने 298 रन बना लिए थे। रन चेज के दौरान चामिंडा वास ने पहले ही ओवर में सचिन तेंदुलकर को मात्र 2 रन पर पवेलियन भेज दिया। मैदान में पिन ड्रॉप सायलेन्स, नम्बर 3 पर आए अपना 22वाँ वन डे खेल रहे महेंद्र सिंह धोनी। वास के अगले ओवर की तीसरी गेंद को धोनी ने कवर के ऊपर से सीमारेखा के पार कर दिया, कॉमेंट्री बॉक्स में बैठे रवि शास्त्री के शब्द “He’s a powerful striker of the ball.”  यह बात तो कुछ माह पूर्व सबको विशाखापट्टनम में पता चल चुकी थी। असल प्रश्न था, “Can he chase ?”  वास ने अपने अगले ओवर में एक और गेंद ऑफ स्टंम्प के बाहर की, परिणाम वही, कवर के ऊपर से छक्का।

12वें ओवर में वास की ही गेंद पर उनके सिर के उठाकर मारे गए चौके से धोनी ने अपने 50 रन पूरे कर लिए। वीरेंद्र सेहवाग के साथ हुई 92 रन की साझेदारी ने रन चेज को पटरी पर ला खड़ा किया था। एक चीज़ जो बदली हुई नजर आ रही थी, वह थी कि विशाखापट्टनम में जहाँ सेहवाग-धोनी की साझेदारी में सेहवाग डॉमिनेंट पार्टनर थे, वहीं जयपुर में डॉमिनेंट पार्टनर धोनी थे।

25वें ओवर की पहली गेंद पर MS धोनी ने अपना शतक पूरा कर लिया। टीम का स्कोर था 169/2. कप्तान राहुल द्रविड़ के साथ हुई 86 रन की साझेदारी के बाद यह मैच पूरी तरह भारत के नियंत्रण में था। 47वें ओवर की पहली गेंद पर लगे धोनी के दसवें छक्के के साथ भारत ने यह मैच 6 विकेट से जीत लिया। किसी भी विकेटकीपर बल्लेबाज के द्वारा बनाया गया यह अबतक का सबसे बड़ा स्कोर था। 2013 में रोहित शर्मा द्वारा लगाए गए 16 छक्कों से पहले एक पारी में सर्वाधिक छक्के लगाने का भारतीय रिकॉर्ड MS धोनी के नाम था।

विश्वदीप घोष की किताब के अनुसार कप्तान राहुल द्रविड़ ने इस पारी की तुलना सचिन तेंदुलकर की शारजाह में खेली गई 143 की पारी से की और कहा, “Anyone who watched it at the ground and on television will agree that it is one of the greatest one-day innings of all time.”

तत्कालीन कोच ग्रेग चैपल ने कुछ दिनों पहले PlayWrite Foundation से Youtube पर हुई बातचीत में बताया कि पुणे में अगले मैच से पहले धोनी से हुई बात में उन्होंने कहा यदि तुम सिर्फ बाउंड्री लगाने के प्रयास में रहोगे तो तुम वह उपलब्धियाँ प्राप्त नहीं कर सकते जो तुम्हें प्राप्त करनी चाहिए। चैपल ने कहा कि वे जानना चाहते थे कि क्या धोनी बिना गेंद को हवा में मारे भी रन बना सकते हैं, वो निश्चित रूप से गेंद को हिट करने में सक्षम थे पर खेल के उनके इस तरीके में रिस्क अधिक था। चैपल मानते थे कि यदि रिस्क कुछ कम कर दिया जाए तो धोनी विश्व क्रिकेट के बेहतरीन फिनिशर्स बन सकते हैं। अगले मैच में धोनी को 6 नम्बर पर भेजा गया, उस समय भारत को 80 से अधिक रन चाहिए थे। चैपल ने धोनी को चैलेंज दिया था कि उन्हें रन गेंद को नीचे खेलकर ही बनाने हैं, तबतक हवा में नहीं खेलना जबतक जीत पक्की न हो जाए। चैपल ने कहा, तुम्हें बेस्ट बाउंड्री हिटर के बजाय बेस्ट फिनिशर बनना है और तुम गेम के इतिहास के बेस्ट फिनिशर बन सकते हो। धोनी ने यह चैलेंज स्वीकार किया। चैपल आगे बताते हैं कि जब 20 के आसपास रन चाहिए थे तो 12th मैन RP सिंह ने उनसे कहा, MS जानना चाहते हैं कि क्या अब वो गेंद को हवा में मार सकते हैं। धोनी ने लगातार दो छक्के लगाकर यह मैच समाप्त किया और कोच के पास से गुजरते हुए कहा, “Is that alright coach ?” कोच ने कहा, “That’s fine.”

कॉमेंटेटर हर्ष भोगले उन दिनों को याद करते हुए  कहते हैं, उन्होंने राहुल द्रविड़ से पूछा कि आप धोनी को इतना नीचे क्यों भेजते हैं, जब नम्बर 3 पर उन्होंने करियर की इतनी शानदार शुरुआत की है, राहुल ने कहा वो धोनी को एक अच्छे फिनिशर के रूप में देखते हैं। “I asked Rahul Dravid why they bat Dhoni down the order and not up at number three where he had made such a spectacular start, Rahul said that they really rated him as a finisher.”

लाहौर 2006, भारत vs पाकिस्तान. तीसरा वन डे। यह वन डे सीरीज 1-1 से बराबर थी। 289 का पीछा करते हुए भारतीय टीम 190 पर 5 हो चुकी थी और संकट में थी। MS धोनी ने यहाँ युवराज के साथ 13 ओवरों में 99 रन की साझेदारी की। इसमें से 72 रन धोनी के थे जो मात्र 46 गेंद में आए थे। (इसी पारी में धोनी ने अपने वन डे करियर में 1000 रन पूरे किए।) यह रन चेज में भारतीय टीम की बढ़ती कुशलता का एक और प्रमाण था। अगले कई वर्षों तक धोनी और युवराज को जोड़ी ने कई यादगार साझेदारियाँ कीं।  अप्रैल 2006 में महेंद्र सिंह धोनी ने अपने वन डे करियर में पहली बार ICC रैंकिंग में नम्बर 1 स्थान प्राप्त किया। इस समय तक उन्होंने 42 मैच खेले थे, उनकी एवरेज 52.76 और स्ट्राइक रेट 103 की थी, वे 2 शतक और 8 अर्धशतक बना चुके थे।

2008 में महेंद्र सिंह धोनी को ICC ODI प्लेयर ऑफ द यर चुना गया, 2009 में उन्होंने पुनः यह पुरस्कार जीता। इस साल धोनी ने 70 की औसत से 24 मैचों में 1198 रन बनाए थे। इसी साल वो ICC में रैंकिंग में एक बार पुनः नम्बर एक पर पहुँचे। धोनी के अतिरिक्त केवल दो खिलाड़ी ऐसे हैं जिन्होंने लगातार दो बार ICC ODI प्लेयर ऑफ द यर का अवार्ड जीता है, विराट कोहली और AB डिविलियर्स। 2007 वर्ल्ड T20, 2011 वर्ल्ड कप, 2013 ICC चैंपियन्स ट्रॉफ़ी की बातें सबको पता हैं।

2013 में वेस्ट इंडीज़ में हुई ट्राई सीरीज के फाइनल में श्रीलंका के सामने 202 रनों के लक्ष्य के सामने भी भारतीय टीम 152 पर 7, 167 पर 8 और फिर 182 पर 9 हो चुकी थी। आखिरी ओवर में 15 रन चाहिए थे। मैच जीतने के लिए लगाए गए धोनी के बल्ले से निकले आखिरी छक्के के साथ साथ कॉमेंटेटर इयन बिशप की एक लाइन भी यादगार हो गई,” Magnificent Mahendra… He’s unbelievable in so many ways.”

इयन बिशप की बात सही है, “He’s unbelievable in so many ways.” उनके पहले भारतीय टीम के पास कभी भी ऐसा विकेटकीपर नहीं रहा था जो प्रॉपर बैट्समैन की भाँति खेल सके, अपने दम पर मैच जीता सके। आज आप देख सकते हैं, पिछले कुछ समय से जितने भी युवा विकेटकीपर उभरकर सामने आ रहे हैं, उनमें से ज्यादातर बेहतरीन बल्लेबाज भी हैं, चाहे संजू सैमसन हों, ऋषभ पंत हों, ईशान किशन हों। महेंद्र सिंह धोनी के आने से पहले भारतीय क्रिकेट में ये स्थिति नहीं थी। विवशता में काफी मैचों में राहुल द्रविड़ को विकेटकीपिंग करनी पड़ी, जो काम उन्हें कुछ खास पसंद नहीं था। महेंद्र सिंह धोनी नाम है उस प्रतीक्षा का जो भारतीय क्रिकेट टीम के फैन्स ने नयन मोंगिया, MSK प्रसाद, विजय दहिया, दीप दास गुप्ता, अजय रात्रा, पार्थिव पटेल को देखते हुए किया।

वन डे में सबसे कम पारियों में दस हज़ार रन पूरे करने वाले बल्लेबाजों में महेंद्र सिंह धोनी छठे स्थान पर हैं। इस लिस्ट में धोनी इसलिए यूनीक हैं क्योंकि लिस्ट में उनसे ऊपर जितने भी बल्लेबाज हैं (विराट, सचिन, सौरव, पोंटिंग और कैलिस) सभी टॉप 3 (या तो ओपनर या वन डाउन) के बल्लेबाज हैं, जबकि धोनी ने अपनी 80% से अधिक पारियाँ नम्बर 5, 6, 7 पर खेली हैं।

भारतीय क्रिकेट इतिहास के महानतम कप्तान और महानतम वन डे बल्लेबाजों में से एक महेंद्र सिंह को जन्मदिन की शुभकामनाएँ।

When Kevin Pietersen’s 186 in Mumbai turned the test series on it’s head.

Kevin Pietersen’s 186 in Mumbai: One of the greatest knocks of all time.

केविन पीटरसन एक साल पहले कप्तान ऐन्ड्रू स्ट्राउस के साथ दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध होम सीरीज में हुए विवाद के कारण टीम से बाहर कर दिए थे। नए कप्तान एलेस्टर कुक ने भारत दौरे के लिए केविन को टीम के साथ “Re-Intigrate” होने का अवसर दिया था। पहला टेस्ट भारत ने आसानी से 9 विकेट से जीत लिया। KP ने दो पारियों में 17 और 2 रन बनाए और दोनों ही बार प्रज्ञान ओझा की लेफ्ट आर्म स्पिन का शिकार बने। ओझा ने इस मैच में 9 विकेट लिए थे।

स्पिन के सामने इंग्लिश बल्लेबाजों की स्थिति सही नहीं थी। दूसरे टेस्ट में मुम्बई में भारत तीन स्पिनर्स के साथ उतरा। हरभजन को भी टीम में शामिल किया गया था। लेकिन इंग्लैंड के पास भी दो बहुत अच्छे स्पिनर थे, ग्रैम स्वॉन और मोंटी पैनेसर।

टॉस जीतकर बल्लेबाजी करने उतरी भारतीय टीम ने 40वें ओवर में सिर्फ 119 रन पर पाँच विकेट गँवा दिए। मोंटी की एक गेंद लेग स्टंप की लाइन में पिच हुई, सचिन फॉरवर्ड डिफेंस के लिए आगे गए। गेंद ने जबरदस्त टर्न लिया और सचिन के बैट को बीट करके ऑफ स्टंप पर लगी। लेफ्ट आर्म स्पिनर की Dream Ball. टेस्ट क्रिकेट में 51 शतक बनाने वाले मास्टर पैनेसर की इस गेंद के सामने बिल्कुल असहाय दिखे। चेतेश्वर पुजारा ने धोनी के साथ 50 और अश्विन के साथ 111 की साझेदारी करके भारत को 200 के अंदर ऑल आउट होने से बचा लिया। भारत के कुल स्कोर 327 में से 135 रन पुजारा के थे। पहले ओवर में आए पुजारा 114वें ओवर तक खेले। जिमी ऐंडरसन द्वारा पहले ओवर में गौतम गंभीर का विकेट लिए जाने के बाद भारत के अगले 9 विकेट स्वॉन और मोंटी ने लिए थे।

जब इंग्लैंड के स्पिनर ऐसा कर सकते हैं तो भारतीय स्पिनर भी कर सकते हैं। भारतीय टीम के फैन्स इसी बात को लेकर आशावान थे। पिच स्पिनर्स के लिए इतनी अच्छी थी कि भारत की गेंदबाजी की शुरुआत अश्विन और ओझा ने की। दूसरे दिन पारी के 34वें ओवर में 68 पर इंग्लैंड का दूसरा विकेट गिरने के बाद क्रीज पर आए केविन पीटरसन। चायकाल से कुछ मिनट पहले KP ने अपनी पहली गेंद खेली। हरभजन की यह गेंद ऑफ स्टंम्प के बाहर रफ में गिरी, धूल उड़ी और KP ने अपनी Slap-Drive कवर्स में खेल दी। यह ऐसा शॉट था जो बल्लेबाज आमतौर पर सेट हो जाने के बाद खेलते हैं, यह एक संदेश था KP की ओर से कि इस मैच में क्या होने वाला है।

चाय के बाद हरभजन की शॉर्ट गेंद स्क्वेयर के पीछे की ओर चौके के लिए कट कर दी गई। इसके बाद फुलर लेंथ की गेंद पर मिडविकेट की ओर चौका। पिछले मैच की दोनों पारियों में आउट करने वाले प्रज्ञान ओझा की गेंद मिडऑफ के पास से ड्राइव कर दी गई। चार ओवर बाद उसी फील्डर के सिर के ऊपर से चार रन।

KP ने स्वीप शॉट का बहुत प्रभावी इस्तेमाल किया। कदमों का प्रयोग करके आगे निकलकर सीधे शॉट भी खेले। 62 गेंदों पर KP का अर्धशतक पूरा हुआ। दूसरे दिन के अंत तक इंग्लैंड का स्कोर था 178 पर 2. तीसरे दिन पारी के 71वें ओवर में ओझा की पहली तीन गेंदों को ब्लॉक किया। चौथी गेंद बहुत अधिक स्पिन हुई और बल्ले के बाहरी किनारे को छोड़ती हुई निकल गई। पाँचवी पर KP ने पैड अड़ाने का प्रयास किया। KP ने छठी गेंद की पिच तक पहुँचने का प्रयास किया पर वे काफी दूर रहे फिर भी उन्होंने इसे मिड ऑन के ऊपर से चौके के लिए भेज दिया। ओझा के अगले ओवर की पहली गेंद शॉर्ट और वाइड थी जो पॉइंट के पास से कट कर दी गई। अश्विन की कैरम बॉल पर KP के जोरदार ड्राइव ने गेंद को कवर बाउंड्री की ओर भेज दिया। हरभजन की ऑफ ब्रेक स्क्वेयर के पीछे स्वीप कर दी गई। 77वें ओवर में हरभजन की पहली गेंद को KP ने स्लिप के पास से रिवर्स स्वीप कर दिया और अपना शतक पूरा किया। कोई बड़ा सेलिब्रेशन नहीं। बस दोनों हाथ ऊपर किए, कप्तान एलेस्टर कुक को गले लगाया। केविन पीटरसन का शतक मात्र 127 गेंदों में बना था।

शतक के बाद पीटरसन की आक्रामकता और बढ़ गई। लेग साइड में बाउंड्री पर तीन फील्डर थे, इसलिए अश्विन की ऑफ स्पिन को KP ने जगह बनाकर मिड ऑफ के ऊपर से 6 रनों के लिए स्टैंड्स में भेज दिया। पारी के 101वें ओवर में ओझा की गेंद पर KP ने एक स्लॉग स्वीप किया, गेंद स्टैंड में और इस प्रकार KP के 150 रन पूरे हुए। इंग्लैंड के लिए सबसे अधिक बार 150 बनाने का Wally Hammond और Sir Leonard Hutton का रिकॉर्ड KP ने बराबर कर लिया था। एक Rank Turner पर भारतीय स्पिनर्स को इस प्रकार डॉमिनेट करने का काम न जाने इससे पिछली बार कब देखा गया था।

केविन पीटरसन की इस ऐतिहासिक पारी का सर्वश्रेष्ठ स्ट्रोक आना अभी शेष था। KP इस समय 159 पर थे, यह पारी का 107वाँ ओवर था, प्रज्ञान ओझा की अराउंड द विकेट से फ्लाइट की हुई गेंद को KP ने एक्सट्रा कवर बाउंड्री के ऊपर से 6 रन के लिए दर्शक दीर्घा में पहुँचा दिया।

111वें ओवर में प्रज्ञान ओझा की गेंद पर KP ने फिर से अपना स्लॉग स्वीप खेला और परिणाम है वही, 6 रन। ओझा के अगले ओवर में जब पीटरसन 186 के स्कोर पर आउट हुए तो वे सीरीज की दिशा बदल चुके थे। मात्र 232 गेंदों में खेली गई 186 रनों की इस पारी में 20 चौके और 4 छक्के थे। ( कप्तान एलेस्टर कुक के साथ उन्होंने तीसरे विकेट के लिए 204 रनों की साझेदारी की थी। कुक ने भी 122 रनों का योगदान दिया था।)

अगले दिन स्वॉन और पैनेसर के सामने भारतीय बल्लेबाज फिर से पूरी तरह नाकाम रहे। पहली पारी में 9 विकेट लेने वाली इस जोड़ी ने दूसरी पारी में 10 विकेट लिए। स्वॉन ने 4 और पैनेसर ने 6। गंभीर और अश्विन के अतिरिक्त कोई भारतीय बल्लेबाज दहाई अंकों में भी नहीं पहुँचा। इंग्लैंड ने यह मैच 10 विकेट से बड़ी आसानी से जीतकर सीरीज बराबर कर दी। चौथे टेस्ट के बाद इंग्लैंड ने यही सीरीज 2-1 अपने नाम करके इतिहास रचा।

इस विजय में KP की 186 रन की पारी बहुत महत्वपूर्ण थी। Wisden ने केविन पीटरसन की इस पारी को 2010 से 2019 के दशक की तीसरी सर्वश्रेष्ठ टेस्ट पारी माना है। 104 टेस्ट में 8181 रन और 23 शतक बनाने वाले केविन इस पारी को अपने करियर की टॉप 3 पारियों में रखते हैं।

क्रिकेट इतिहास के महान बल्लेबाजों में से एक केविन पीटरसन को जन्मदिन की शुभकामनाएँ।

ICC World Cup 1983: When Kapil Dev’s men took down the mighty West Indies.

24 जून 1983 को समाचार आया कि क्लाइव लॉयड 25 जून को लॉर्ड्स में होने वाले वर्ल्ड कप फाइनल के बाद वेस्ट इंडीज़ की कप्तानी छोड़ देंगे। उनके साथी अपने महान कप्तान को वर्ल्ड कप की हैट्रिक से बड़ा फेयरवेल उपहार दे नहीं सकते थे।

प्रैक्टिस सत्र में बलविंदर सिंह संधू ने अपने सीनियर मदन लाल से पूछा, “पाजी, आप जब मर्जी तब ऑफ कटर कैसे फेंक लेते हैं?” मदन लाल ऑफ कटर समझाने की कला में उतने निपुण नहीं थे जितने वे ऑफ कटर डालने की कला में थे। नेट्स में संधू को एक के बाद एक इनस्विंगर डालते देख कप्तान कपिल ने कहा, “ओये सरदार, अपनी आउटस्विंग पर ध्यान दे। इंटरनेशनल लेवल पर विकेट आउटस्विंग से ही मिलेंगे।”

गावस्कर और श्रीकांत कपिल की लास्ट मिनट सलाह सुनकर मैदान में आए थे। कपिल ने कहा था, यह पिच 70% गेंदबाजों और 30% बल्लेबाजों के पक्ष में है। अतः तेज गेंदबाजों को बहुत सावधानी से खेलना है और रन बनाने के लिए विव रिचर्ड्स और लैरी गोम्स की पार्ट टाइम ऑफ स्पिन की प्रतीक्षा करो। गावस्कर सेट होने का प्रयास कर रहे थे और दूसरे छोर पर खड़े श्रीकांत अपना मनपसंद गाना “तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अनजाना” गुनगुना रहे थे। रॉबर्ट्स की तेज आउटस्विंगर गावस्कर के बल्ले का बाहरी किनारा लेकर विकेटकीपर जेफरी डूजॉन के हाथों में चली गई।

Swashbuckling Cheeka took on the best set of fast bowlers ever assembled: 23 वर्षीय कृष्णमाचारी श्रीकांत “चीका” ने 6 फुट 8 इंच के “Big Bird” जोएल गार्नर की एक गेंद को फ्रंटफुट पर डिफेंड करने का प्रयास किया। गेंद ने खतरनाक उछाल लिया और श्रीकांत के ग्लब्स पर लगी। श्रीकांत इस चोट से तिलमिला उठे, उन्होंने स्वयं से कहा, भाँड़ में गई कप्तान की सलाह, अब मैं अपने तरीके से खेलूंगा। “The skipper’s advice be damned, it’s time for Plan B.” ऐंडी रॉबर्ट्स की एक शॉर्टपिच गेंद पर उन्होंने बैकफुट पर ज़ाक़र पुल किया और गेंद को मिडविकेट बाउंड्री के पार कर दिया। चीका ने चिंताओं को खिड़की से बाहर फेंक दिया था। रॉबर्ट्स ने इससे भी शॉर्ट गेंद फेंकी, पहले से तेज. जवाब में चीका का बैट स्विंग इससे भी तेज। स्क्वेयर लेग बाउंड्री से बाहर, 6 रन। गुंडप्पा विश्वनाथ श्रीकांत के हीरो थे। रॉबर्ट्स की ही गेंद पर बिल्कुल विश्वनाथ के ही स्टाइल में घुटने पर बैठकर श्रीकांत ने एक स्क्वेयर ड्राइव खेली। गेंद विज्ञापन की होर्डिंग से टकराई।

Srikkanth’s drive.(Image Source: Getty Images)

श्रीकांत ने अपना पोज होल्ड किया, दायाँ घुटना पिच पर, शर्ट के ऊपरी दो बटन खुले, निगाहें सीमारेखा की ओर जा रही गेंद की दिशा में, बैट ऊपर की ओर, बल्ले के पीछे Black Panther का स्टिकर और मैदान में उपस्थित 14 अन्य लोग एकदम स्तब्ध। महान फोटोग्राफर Patrick Eager ने इस शॉट की एक बहुत ही सुंदर फोटो ली है। श्रीकांत अबतक कट, पुल, हुक, ड्राइव हर शॉट खेल चुके थे। क्रिकेट इतिहास में एक साथ खेलने वाले सबसे महान गेंदबाजों की यूनिट चीका के खेलने के अंदाज़ से अधिक परिचित नहीं थी। लम्बे स्पेल के बाद रॉबर्ट्स और होल्डिंग को आराम दिया गया पर भारतीय बल्लेबाजों के लिए कोई आराम नहीं था क्योंकि नए गेंदबाज थे माइकल होल्डिंग और मैल्कम मार्शल।

मोहिंदर “जिमी” अमरनाथ पर एक के बाद बाउंसरों की बौछार हो रही थी। कुछ महीने पहले Barbados टेस्ट में मार्शल की एक गेंद ने उनके ऊपरी होंठ को ऐसा घायल किया था कि कई टाँके लगे थे। मार्शल की गेंद एक बार फिर से उसी दिशा में बढ़ रही थी। लेकिन इस बार जिमी का बल्ला बीच में आ गया। जिमी ने अपना ट्रेडमार्क नटराज पुल खेला था।

Jimmy’s Natraja Pull. (Image Source: Getty Images)

20वें ओवर में स्कोर जा पहुँचा था 59/1, इसमें से 38 रन श्रीकांत के बल्ले से आए थे। मैल्कम मार्शल की गेंद आड़े बल्ले से खेलने के प्रयास में श्रीकांत एलबीडबल्यू हो गए। सात चौके और एक छक्के के साथ 57 गेंद में 38 रन का यह स्कोर इस पारी में प्रदर्शित की गई हिम्मत और इस पारी का इम्पैक्ट नहीं दिखा रहा था। अंत में यह मैच का सर्वाधिक स्कोर सिद्ध हुआ।

Srikkanth trapped in front by Marshall.
Jimmy Amarnath bowled by Michael Holding (Image Source: Getty Images)

जिमी के आउट होने के बाद स्कोर को 90 पर 2 से 130 पर 7 होने में अधिक देरी नहीं लगी। मदन लाल, किरमानी और संधू के छोटे छोटे पर महत्वपूर्ण योगदानों के कारण स्कोर 183 तक पहुँचा। इस दौरान एक घटना घटी, उस समय के शायद सबसे तेज गेंदबाज मैल्कम मार्शल की एक बाउंसर सीधी बलविंदर सिंह संधू के हेलमेट पर लगी। संधू खड़े रहे लेकिन वो कष्ट में दिख रहे थे, उनका सिर घूमने लगा था। विकेटकीपर जेफरी डूजॉन ने उनका हालचाल लेने का प्रयास किया। कॉमेंट्री बॉक्स से लेकर फील्ड अंपायर डिकी बर्ड कोई भी मार्शल की इस हरकत से प्रसन्न नहीं हुआ। आज जैसे हेलमेट की अनुपलब्धता के कारण एक नम्बर 11 के विरुद्ध इस प्रकार का बाउंसर फेंकना उस समय उचित नहीं माना जाता था। डिकी बर्ड ने मार्शल से क्षमा माँगने को कहा, मार्शल ने बड़े अनमने ढंग से अपना हाथ ऊपर कर दिया।

भारत के 183 पर आउट हो जाने के बाद वेस्ट इंडीज़ के नम्बर 10 (बैटिंग ऑर्डर में) जोएल गार्नर ने नम्बर 8 मार्शल से पूछा, “तुम्हें लगता है, आज तुम्हें बैटिंग करनी होगी?” मार्शल ने कहा, “हाँ, और तुम्हें भी करनी होगी। जब हम किसी छोटे लक्ष्य का पीछा करते हैं तो हर व्यक्ति दूसरे से ही काम खत्म करने की आशा करता है।”

जब भारतीय टीम फील्डिंग के लिए मैदान में प्रवेश कर रही थी तो वेस्ट इंडीज़ के दर्शकों की ओर से लगातार मजाक उड़ाया जा रहा था। गावस्कर उनकी बातों का उत्तर अपनी त्रिनिडाडियन ऐक्सेंट में दे रहे थे जो उन्होंने वेस्ट इंडीज़ में काफी समय तक खेलने के दौरान सीखी थी।

बलविंदर सिंह संधू ने कुछ महीने पहले वेस्टइंडीज में हुई टेस्ट सीरीज के दौरान पोर्ट ऑफ स्पेन टेस्ट में वेस्ट इंडीज़ के दोनों ओपनर्स ग्रीनिज और हेन्स को पहले ही स्पेल में आउट कर दिया था। संधू को यह बात आज भी याद आ रही थी। कपिल ने संधू को सख्त निर्देश दिए थे, बस इसपर नज़र रखना कि संदीप पाटील कहाँ खड़ा है। यदि वह थर्डमैन पर है तो इनस्विंगर फेंकना और यदि फाइन लेग पर है तो आउटस्विंगर, यदि गेंद उसकी तरफ गई तो वह मिस्फील्ड करेगा और हम हार जाएंगे। संधू को प्रैक्टिस के दौरान अपने कप्तान की कही हुई बात भी याद थी, “ओये सरदार, अपनी आउटस्विंग पर ध्यान दे।” गॉर्डन ग्रीनिज अपनी इस पारी की 12वीं गेंद खेल रहे थे, उन्होंने इस बार भी आउटस्विंग की अपेक्षा करते हुए गेंद को छोड़ दिया। लेकिन ये इनस्विंगर निकली और स्टम्प पर जा लगी।

Gordon Greenidge bowled by Sandhu’s inswinger. (Image Source: Getty Images)
Viv Richards arrives. (Image Source: Getty Images)

Arrival of the King: ग्रीनिज के विकेट के बाद क्रीज पर आए गेंदबाजों के मन में सबसे ज्यादा भय पैदा करने वाले आइजैक विवियन अलेक्जैंडर रिचर्ड्स। कपिल की एक आउटस्विंगर पर एक कदम बाहर निकालकर विव ने स्ट्रेट ड्राइव से चौका जड़ दिया। कपिल की अगली गेंद फिर उसी लेंथ पर गिरी लेकिन इस बार यह इनस्विंगर थी। विव ने इसे स्क्वेयर लेग की ओर घुमा दिया, एक और चौका। वेस्ट इंडियन बालकनी में ऑस्ट्रेलिया के महान तेज गेंदबाज डेनिस लिली भी विव की बल्लेबाजी का आनंद ले रहे थे। कपिल ने मदन लाल को गेंद सौंपी। इस ओवर में विव ने तीन चौके जड़े। तीनों मैदान के अलग अलग हिस्से में, मिडविकेट, एक्स्ट्रा कवर और पॉइंट। वेस्ट इंडियन दर्शक स्टेडियम में कैरिबियन संगीत और Lager (बीयर) के साथ साथ अपने हीरो की विस्फोटक पारी का आनंद ले रहे थे।

विव के इस अंदाज को देखकर स्टेडियम में मैच देख रही भारतीय खिलाड़ियों की पत्नियों को अंदाज़ा लग गया कि अब ये मैच थोड़ी देर का ही है, इन सबने अपनी अपनी शॉपिंग बुक बाहर निकाल ली। थर्ड मैन बाउंड्री पर खड़े संदीप पाटील को मिसेज गावस्कर ने कहा, “हम लोग ऑक्सफ़ोर्ड स्ट्रीट की ओर निकल रहे हैं। सुनील को बता देना।” मिसेज गावस्कर, मिसेज कपिल देव और मिसेज मदन लाल, ये तीनों खरीददारी के लिए निकल पड़ीं। गार्ड ने कहा इन टिकटों पर दुबारा एंट्री नहीं मिलेगी। लेकिन इन महिलाओं को ऐसा एकतरफा मैच देखने का अब और मन नहीं था।

डेसमंड हेन्स 13 रन बनाकर आउट हो गए और आखिरी बार वन डे में कप्तानी कर रहे क्लाइव लॉयड Standing Ovation के बीच क्रीज पर आए। मदन लाल हेन्स का विकेट लेकर काफी उत्साहित थे और अब वो विव को एक और ओवर करना चाहते थे। लेकिन विव द्वारा एक ओवर में 3 चौके पड़ने के कारण कप्तान उन्हें एक और ओवर देने को तैयार नहीं थे। अब वे रन रोकना चाहते थे। कपिल ने कहा, “मद्दी पा, अब आप थोड़ा ब्रेक लो, कुछ देर फिर से आपको ओवर दिया जाएगा।” मद्दी पा (मदन लाल) बोले, “कप्तान, मुझे गेंद दो, मैंने Berbice (Guyana) में भी विव को आउट किया है, यहाँ भी कर दूँगा, प्लीज़ एक ओवर बस।”

The Catch: मदन लाल की एक गेंद शॉर्ट गिरी। विव ने गेंद की उपेक्षा सी करते हुए पुल शॉट खेला, लेकिन गेंद बल्ले के ऊपरी हिस्से पर लग गई और आकाश में बहुत ऊपर गई। लॉर्ड्स में समय रुक गया था। आइजैक विवियन अलेक्जैंडर रिचर्ड्स का विकेट मिलना मैच की पूरी दिशा बदल सकता था। यशपाल शर्मा डीप स्क्वेयर लेग पर खड़े थे, वे भी कैच के लिए आगे आने लगे। थर्डमैन पर खड़े टीम के संभवतः सबसे खराब फील्डर संदीप पाटील इस बात के लिए भगवान को धन्यवाद दे रहे थे कि वे वहाँ नहीं खड़े जहाँ कपिल खड़े हैं, वरना उन्हें कैच के लिए दौड़ना पड़ता। कपिल मिडविकेट पर खड़े थे, उन्होंने उल्टी दौड़ लगानी शुरु की। कैच के लिए हाथ बढाने के पहले कपिल ने यशपाल को चिल्लाकर स्पष्ट कर दिया, “यश रुक जाओ, ये मेरा है।” 20 यार्ड की दौड़ के बाद गेंद कपिल के हाथों में गिरी। कपिल द्वारा लिए गए इस अकल्पनीय कैच से स्टेडियम में उपस्थित भारतीय दशकों में अचानक से ऊर्जा आ गई। उल्लास का वातावरण बन गया। “Viv c Dev b Lal” शॉपिंग के लिए निकल चुकीं मिसेज देव और मिसेज लाल को इस बात की कोई खबर नहीं थी। डेढ़ साल पहले जनवरी 1982 में अमेरिकन फुटबॉल कॉन्फ्रेंस (AFC) चैंपियनशिप मैच में Joe Montana के थ्रो पर Dwight Clark का कैच इतना प्रसिद्ध हुआ कि उसे “The Catch” का नाम दे दिया गया था। कपिल का कैच इससे कम इससे कम महत्वपूर्ण नहीं था।

Kapil takes an unbelievable catch to dismiss Viv.

विव के आउट होते ही अचानक से कॉमेंटेटर भारत की विजय की संभावनाओं पर चर्चा करने लगे। लैरी गोम्स के विकेट के बाद वेस्ट इंडीज़ का स्कोर हो चुका था 66 पर 4. लेकिन कपिल को पता था कप्तान क्लाइव लॉयड अभी भी मैच जीताने की क्षमता रखते हैं, 1975 के विश्वकप फाइनल में मैन ऑफ द मैच रहे लॉयड ने 102 रन बनाकर वेस्ट इंडीज़ को न सिर्फ संकट से निकाला था बल्कि एक बड़े स्कोर तक पहुँचाया था। कपिल ने रॉजर बिनी से कहा, फुल और स्ट्रेट रखो गेंद को। बिनी ने यही किया, लॉयड की ड्राइव सीधी कपिल के हाथों में चली गयी। 66 पर 5. लॉयड के विकेट के बाद पहली बार इस मैच में वेस्ट इंडीज़ के कैम्प में पैनिक आरम्भ हुआ। 76 रन पर छठा विकेट गिरा तो विकेटकीपर किरमानी भी कष्ट में थे, विकेट का जश्न मनाने के चक्कर में श्रीकांत अपनी Spikes के साथ उनके जूते पर चढ़ गए थे, जिससे किरमानी के पैर से खून निकल गया था। एक शानदार कैच का ऐसा पुरस्कार कम ही मिलता है।

अब 108 रन चाहिए थे और मात्र 4 विकेट शेष थे। BCCI के अधिकारियों को जीत दिखाई पड़ने लगी थी। जश्न के लिए ड्रेसिंग रूम से बेहतर स्थान क्या हो सकता था। लेकिन जेफरी डूजॉन और मैल्कम मार्शल अभी फाइट करने को तैयार थे। दोनों ने एक-एक, दो-दो रन लेने शुरु किए। एक शॉर्ट पिच गेंद पर डूजॉन के छक्के ने वेस्ट इंडीज़ का स्कोर 100 के पार पहुँचा दिया। शान्त हो चुके कैरेबियाई दर्शकों में अचानक से जोश का संचार हो गया। कपिल भी अब दबाव में थे, गेंदबाज संधू को लाइन लेंथ बताने के दौरान दोनों में बहस होने लगी। संधू ने उपकप्तान जिमी से शिकायत की। जिमी ने कपिल को बाउंड्री पर भेजा और स्वयं उनके स्थान पर खड़े हो गए।

ड्रेसिंग रूम में उपस्थित रिजर्व खिलाड़ियों रवि शास्त्री और दिलीप वेंगसरकर ने टीम मैनेजर मान सिंह से शिकायत करते हुए कहा कि ये BCCI वाले जबसे घुसे हैं ड्रेसिंग रूम में, तब से पनौती लग गई है। इनको हटवाया जाए। ये काम मान सिंह के अधिकार क्षेत्र से बहुत ऊपर था।

मार्शल और डूजॉन के बीच 7वें विकेट के लिए 43 रन की साझेदारी हो चुकी थी। 114 गेंदों पर मात्र 65 रनों की आवश्यकता थी। सुनील गावस्कर ने कप्तान से कहा, जिमी अमरनाथ को लगाया जाना चाहिए अटैक पर। अभी तक उन्होंने ज्यादा रन नहीं दिए। जिमी की गेंद अंदर आई, डूजॉन तय नहीं कर पाए कि इस गेंद को खेलना है या छोड़ना है। अंत में उन्होंने इसे छोड़ दिया। गेंद स्टम्प पर जा लगी। 5 रन के बाद मैल्कम मार्शल भी जिमी की गेंद पर आउट हो गए। कप्तान कपिल ने जब ऐंडी रॉबर्ट्स को आउट किया तो वेस्ट इंडीज़ को जीत के लिए 58 रन चाहिए थे और केवल एक विकेट शेष था। 52वें ओवर में जिमी अमरनाथ की आखिरी गेंद माइकल होल्डिंग के पैड पर लगी। अंपायर डिकी बर्ड ने तुरन्त उंगली ऊपर कर दी। वेस्ट इंडीज़ लक्ष्य से 43 रन पीछे रह गयी थी। जिमी एक विकेट उखाड़कर पवेलियन की ओर दौड़े, डिकी बर्ड ने भी एक विकेट के साथ दौड़ लगा दी। सुनील गावस्कर ने गेंद जेब में रखी और अपने जीवन की सबसे तेज दौड़ लगाई।

26 बनाने के साथ साथ 7 ओवर में 12 रन पर 3 विकेट लेने वाले जिमी अमरनाथ मैन ऑफ द फाइनल थे।

मैच से पहले कॉमेंटेटर Richie Benaud के अनुसार भारत की विजय के Odds थे, 66:1. टीम चयन पर हुआ विवाद, कप्तानी पर हुआ विवाद, गावस्कर से मतभेद, ज़िम्बाब्वे के विरुद्ध 17 पर 5, विशेषज्ञों द्वारा भारतीय टीम के इस विश्वकप में जीतने के चांस नगण्य बताया जाना… ट्रॉफी उठाते समय कपिल के मन में यह सारे विचार तैर रहे थे। पिछले दो विश्वकप मिलाकर केवल एक मैच (पूर्वी अफ्रीका के विरुद्ध) जीतने वाली टीम आज विश्व चैम्पियन थी।

सर गारफील्ड सोबर्स भी स्टैंड में उपस्थित थे। जब उनसे ऑटोग्राफ मांगे जा रहे थे तब उन्होंने कहा, “Not today, this is India’s day”

क्लाइव लॉयड से जब मैच पर उनके विचार पूछे गए तो उन्होंने कहा “Indian cricket has arrived. And it’s here to stay.”

(एकाध बातों के अतिरिक्त लगभग सारा कंटेंट निखिल नाज़ की किताब “Miracle Men” से)

ICC Champions Trophy 2013: When MS Dhoni’s men created history

शिखर धवन ने ICC चैंपियंस ट्रॉफी 2013 से पहले मात्र 5 वन डे मैच खेले थे और कुल 69 रन बनाए थे 13.8 की औसत से। रोहित शर्मा की वन डे टीम में जगह अभी भी पक्की नहीं थी और उन्हें चैंपियंस ट्रॉफी में ओपनिंग करने का दायित्व मिला था। वन डे क्रिकेट इतिहास की सबसे महान ओपनिंग जोड़ियों में से एक की शुरुआत 6 जून 2013 को इंग्लैंड में सोफ़िया गार्डन्स में दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध हुई। दोनों ने पहले विकेट के लिए 127 रन जोड़े। रोहित ने 65 और शिखर ने 114 रन बनाए। इस मैच में जीत के साथ महेन्द्र सिंह धोनी के नेतृत्व वाली भारतीय टीम ने एक और ICC टूर्नामेंट जीतने की ओर कदम बढ़ा दिया।

2013 शिखर धवन का साल था। धवन ने अगले मैच में वेस्ट इंडीज़ के विरुद्ध भी एक शतक लगा दिया। भारत ने यह मैच 8 विकेट से जीत लिया। बारिश से प्रभावित तीसरे और अंतिम लीग मैच में पाकिस्तान को 8 विकेट से पीटकर भारतीय टीम सेमीफाइनल में पहुँची। इशांत शर्मा के 3 विकेट और कोहली-धवन के अर्धशतकों के दम पर भारत ने सेमीफाइनल भी आसानी से 8 विकेट से जीत लिया।

फाइनल तक आने में भारत को कोई खास संघर्ष नहीं करना पड़ा था। फाइनल एजबेस्टन में खेला जा रहा था। सामने थी अपने घरेलू मैदान पर खेल रही इंग्लैंड की टीम। बहुत देर तक बारिश होती रही। भारत में तो प्रतीक्षा करते करते रात के 9 बज गए थे। अंत में 20-20 ओवर का मैच शुरु हुआ। टॉस में कोई विलंब नहीं हुआ था, टॉस पहले ही हो गई थी, इंग्लैंड ने गेंदबाजी चुनी थी। 13 ओवर के बाद भारत का स्कोर था 66 रन पर 5 विकेट। इसमें से 31 रन शिखर धवन के थे। जीतने वाले लक्षण तो कतई नहीं दिख रहे थे, पर विराट कोहली अभी भी क्रीज पर थे और उनके साथ थे रवींद्र जडेजा। भारतीय खेमे में माहौल गंभीर था। विराट और जडेजा की साझेदारी ने स्कोर को 100 के पार पहुँचाया, दोनों ने 33 गेंद में 47 रन जोड़े। ये रन बहुत ज्यादा नहीं थे पर इस मैच के संदर्भ में इनका महत्व अधिक था। विराट भारत की ओर से टॉप स्कोरर रहे उन्होंने 34 गेंद में 43 रन बनाए। जडेजा ने भी अंत में 2 छक्के और 2 चौके के साथ 25 गेंद में 33 रन बनाए और स्कोर को 129 तक पहुँचाया।

अब कम से कम फाइट तो दी ही जा सकती थी। कप्तान ने ड्रेसिंग रूम में अपनी टीम से यही कहा कि आकाश की ओर बारिश की उम्मीद से मत देखो। वहाँ से कोई सहायता नहीं आने वाली। हम नम्बर 1 ODI टीम हैं इसलिए इन 130 रनों के लिए फाइट करनी है। 8.4 ओवर के बाद इंग्लैंड का स्कोर था 46 रन पर 4 विकेट। अश्विन और जडेजा के सामने इंग्लिश बल्लेबाज कुछ कर नहीं पा रहे थे। अश्विन के पहले स्पेल के आँकड़े थे- 3 ओवर, 1 मेडेन, 6 रन और 2 विकेट।

अभी कुछ दिन पूर्व लॉकडाउन के दौरान अश्विन और सुरेश रैना की इंस्टाग्राम चैट के दौरान एक रोचक बात पता चली। अश्विन ने बताया कि जब धोनी ने उन्हें उनका पहला ओवर करने के लिए गेंद दी तो जॉनाथन ट्रॉट बल्लेबाजी कर रहे थे। धोनी ने कहा था कि ट्रॉट को ओवर द विकेट से गेंद मत करना, अराउंड द विकेट से करना। वो लेग साइड पर खेलने जाएगा, गेंद घूमी तो स्टम्प हो जाएगा। हुआ भी बिल्कुल यही, अश्विन ने लेग साइड में वाइड फेंकी और ट्रॉट को धोनी ने स्टम्प कर दिया। अश्विन ने इस चैट में कहा कि उन्हें नहीं पता कि धोनी को ये सब कैसे पता था। जो रूट के लिए भी कुछ ऐसी ही योजना थी, अश्विन अराउंड द विकेट से गेंदबाजी कर रहे थे। सुरेश रैना बैकवर्ड शॉर्टलेग पर खड़े थे, धोनी ने उनसे कहा था बस वहीं खड़े रहो ताकि ये यहाँ से सिंगल का प्रयास न करे और उठाकर खेले। रुट ने उठाकर ही मारा और फाइन लेग पर इशांत शर्मा को कैच दे बैठे। (इस चैट का वीडियो कॉमेंट में है)

भारत ने मैच को कंट्रोल करना आरम्भ कर दिया था पर खेल फिर से पलटा, ऑइन मॉर्गन और रवि बोपारा की जोड़ी ने सम्भलकर खेलते हुए 14 ओवर में स्कोर को 71 तक पहुँचाया। अब 6 ओवर में 59 रन चाहिए थे, 6 विकेट हाथ में थे और दो सेट बल्लेबाज क्रीज पर थे। अगले तीन ओवरों में मॉर्गन और बोपारा ने 31 रन बना दिए। अब स्कोर था 17 ओवर में 102 रन। 3 ओवर में 28 रन कोई बड़ी बात नहीं थी। कप्तान धोनी ने 18वें ओवर के लिए जब इशांत शर्मा को गेंद सौंपी तो हर ओर यही प्रश्न था, इशांत ही क्यों ? आप CricInfo पर कॉमेंट्री पढ़ें तो इस प्रकार के प्रश्न दिख जाएंगे वहाँ। लेकिन इसके लगभग 6 साल पहले Bullring, Johannesburg में भी इसी तरह के प्रश्न लोगों के दिमाग में थे। सेमीफाइनल में मैन ऑफ द मैच रहे इशांत शर्मा को इसके पहले 3 ओवर में 27 रन पड़ चुके थे। उनके इस ओवर की पहली गेंद डॉट रही, दूसरी गेंद शॉर्ट, लेग स्टम्प पर। मॉर्गन ने इस बेहद वाहियात डिलीवरी को फाइन लेग सीमारेखा के पार कर दिया, 6 रन। इसके बाद दो लगातार वाइड। कप्तान कितना भी कूल हो, ऐसे में तो वो भी आपा खो ही देगा, लेकिन MS धोनी ने नहीं खोया।

रविचंद्रन अश्विन मिडविकेट पर खड़े थे सर्कल में। 16 गेंदों में मात्र 20 रन चाहिए थे। इशांत शर्मा की एक स्लोअर गेंद पर मॉर्गन जल्दी शॉट खेल गए और गेंद सीधी अश्विन के हाथों में चली गई। अश्विन की जगह बदल दी गई थी, अब वो सर्कल में स्क्वेयर लेग पर खड़े थे। इशांत की एक और शॉर्ट गेंद, बोपारा का शॉट सीधा अश्विन के हाथों में। दो गेंद के अंदर इशांत शर्मा ज़ीरो से हीरो बन चुके थे। दो गेंद में दोनों सेट बल्लेबाज पवेलियन में। अगले दो ओवर कप्तान के दो भरोसेमंद गेंदबाजों अश्विन और जडेजा के थे।

2 ओवरों में 19 रन की आवश्यकता। गेंद रवींद्र जडेजा के हाथों में। जडेजा ने दूसरी गेंद पर बटलर को आउट किया और इस ओवर में मात्र 4 रन दिए। उनके आँकड़े थे 4 ओवर में 24 रन देकर 2 विकेट। स्कोर 115 पर 8.

कप्तान यदि रन न बनाए या विकेट न ले तब भी उसका एक काम शेष रहता है, वो है कप्तानी। बारिश हुई थी, इसके बाद भी पिच सूखी थी, इसलिए धोनी ने 3 ओवर सुरेश रैना से करा लिए। प्रमुख गेंदबाजों उमेश यादव और भुवनेश्वर कुमार को मिलाकर 5 ओवर ही मिले। स्पिन गेंदबाजों के समय दो या तीन फील्डर हमेशा बैट्समैन के आस पास खड़े रहे। चाहे स्लिप, लेग स्लिप, फॉरवर्ड या बैकवर्ड शॉर्टलेग। गार्डियन अखबार ने लिखा है, ये मात्र एक संयोग तो नहीं हो सकता कि इंग्लैंड के निचले क्रम में लेफ्ट हैंडर ज्यादा थे और उन्हें ऑफ स्पिनर अश्विन को खेलना पड़ा जिसकी गेंद उनके लिए बाहर निकलेगी।

अंतिम ओवर में इंग्लैंड को 15 रन चाहिए थे, टूर्नामेंट का आखिरी ओवर लेकर इस मैच के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज रविचंद्रन अश्विन चले। पहली गेंद डॉट, अगली फुलटॉस और चार रन। 4 गेंद में 11 रन, अगली तीन गेंद पर 1,2,2। आखिरी गेंद पर 6 रनों की आवश्यकता, छक्के से इंग्लैंड की विजय, सुपर ओवर के लिए 5 और इससे कम कुछ भी आया तो भारत चैंपियन। जेम्स ट्रेडवेल स्ट्राइक पर, अश्विन की गेंद, प्रॉपर ऑफ स्पिन, ट्रेडवेल ने बैट घुमाया पर मिस कर गए। गेंद विकेटकीपर कप्तान के ग्लब्स से लगकर नीचे गिरी। भारत ने यह मैच 5 रन से जीत लिया था। हर्ष भोगले ने कॉमेंट्री बॉक्स में कहा, “Tredwell misses. Dhoni misses but it doesn’t matter. England capitulate. It’s been a tremendous bowling performance and Mahendra Singh Dhoni… well… this was the one trophy he didn’t have. He’s got it now.”

आप यदि मैच की हाइलाइट्स देखें तो आखिरी गेंद डॉट होने के बाद कप्तान की जो भाव भंगिमा दिखेगी वो उनके चेहरे पर बहुत कम दिखाई देती है। इससे पता चलता है उनकी मनोदशा क्या थी इस समय। पिछले डेढ़-दो वर्ष में दो टेस्ट सीरीज में 0-8 का पूरा ब्लेम उन्हें ही मिला था। तीन महीने पहले भारत द्वारा ऑस्ट्रेलिया को 4-0 से टेस्ट सीरीज हराकर बदला लेने की चर्चा भी कम हुई थी (न जाने क्यों)। इस ICC चैंपियंस ट्रॉफी में वे एक युवा टीम लेकर आए थे, टॉप 7 में से केवल 3 बल्लेबाज ऐसे थे जिन्होंने 2011 विश्वकप खेला था।

33 रन बनाने के साथ साथ 4 ओवर में 24 रन देकर दो विकेट लेने वाले रवींद्र जडेजा मैन ऑफ़ द फाइनल रहे। 90.75 की औसत और 101.4 की स्ट्राइक रेट से 363 रन बनाने वाले शिखर धवन मैन ऑफ द टूर्नामेंट हुए।

यह टूर्नामेंट विजय टीम वर्क का परिणाम थी। शिखर धवन और रोहित शर्मा के रूप में भारत को एक नई ओपनिंग जोड़ी मिली, जो अभी भी चल रही है। भुवनेश्वर कुमार पिछले साल इंजरी होने से पहले तक भारत के प्रमुख वन डे गेंदबाजों में रहे। अश्विन और जडेजा अगले साढ़े तीन – चार साल तक भारत के लिए मैच विनर साबित होते रहे। जडेजा अभी भी वन डे टीम का हिस्सा है। यह टीम इस टूर्नामेंट की सर्वश्रेष्ठ फील्डिंग टीम भी थी। ट्रॉफी कैबिनेट में तीसरी ICC ट्रॉफी आने के बाद कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी की लेगेसी पर कोई प्रश्नचिह्न (यदि रहा हो) तो वो अब शेष नहीं बचा था।

MS निर्विवाद रूप से अब भारतीय क्रिकेट इतिहास के महानतम कप्तान बन चुके थे। हालाँकि ये काम 2011 में हो चुका था, पर 2011 वाली टीम में जहाँ एक से बढ़कर एक सुपरस्टार थे, वहीं 2013 वाली टीम बिल्कुल अलग थी। भारतीय क्रिकेट को यहाँ से आगे ले जाने का काम अब इस युवा टीम के जिम्मे था। इस समय शिखर धवन 27, रोहित 26, विराट 24, रैना 26, भुवनेश्वर 23, अश्विन 26, जडेजा 24 साल के थे। कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी के अतिरिक्त इस टीम के 4-5 खिलाड़ी भारत की ऑल टाइम ग्रेट वन डे टीम में हो सकते हैं।

आज इस चैंपियंस ट्रॉफी की विजय के सात वर्ष पूरे हो गए।

Rajinder Goel: Highest Wicket-taker in the history of Ranji-Trophy but never played test cricket.

हर खेल में कुछ खिलाड़ी होते हैं जिनकी क्षमता और महानता के बारे में इस कारण भी पता नहीं लग पाता क्योंकि वे ऐसे दौर में पैदा होते हैं जिसमें उनसे बड़े नाम होते हैं। दुर्भाग्यवश उन्हें वह प्रसिद्धि नहीं मिल पाती जिसके वे अधिकारी होते हैं।

साठ और सत्तर के दशक में भारतीय टीम की स्पिन चौकड़ी विश्व प्रसिद्ध थी। लेफ्ट आर्म स्पिनर बिशन सिंह बेदी, राइट आर्म ऑफ स्पिनर इरापल्ली प्रसन्ना, राइट आर्म लेग स्पिनर भागवत चंद्रशेखर और राइट आर्म ऑफ स्पिनर श्रीनिवास वेंकटराघवन। यह स्पिन चौकड़ी बहुत सफल रही।

भारत vs वेस्ट इंडीज़ टेस्ट सीरीज 1974-75 में टेस्ट इतिहास के दो महान बल्लेबाजों ने बैंगलोर में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया, इनके नाम थे गॉर्डन ग्रीनिज और विवियन रिचर्ड्स। इसी मैच में एक और महान खिलाड़ी का पदार्पण हो सकता था पर टीम कॉम्बिनेशन ऐसा था कि उस खिलाड़ी को अवसर न मिल सका। यह खिलाड़ी थे लेफ्ट आर्म स्पिनर राजिंदर गोयल।

विश्व क्रिकेट के सर्वश्रेष्ठ लेफ्ट आर्म स्पिनर्स में से एक बिशन सिंह बेदी अनुशासनात्मक कारणों से बैंगलोर टेस्ट से ड्रॉप हो गए थे। उनके स्थान पर दूसरे लेफ्ट आर्म स्पिनर राजिंदर गोयल को चुनने के बजाय मैनेजमेंट ने लेग स्पिनर भागवत चंद्रशेखर और दो ऑफ स्पिनर प्रसन्ना और वेंकटराघवन के साथ जाना उचित समझा। सुनील गावस्कर ने अपनी किताब “Idols” में लिखा है कि गोयल नई किट और नए जूते भी ले आए थे पर अंत में उन्हें पता चला कि वे 12वें खिलाड़ी ही रहेंगे। अगले टेस्ट में बिशन सिंह बेदी वापस आ गए और गोयल को फिर कभी टीम में नहीं चुना गया।

राजिंदर गोयल ने बाद में कहा, “जब भारतीय टीम दो ऑफ स्पिनर (प्रसन्ना और वेंकट) लेकर खेल सकती है, तो उन्हें दो लेफ्ट आर्म स्पिनर के साथ खेलने से कौन रोक रहा था ? मुझे लगता है वे मुझे टीम में लेना ही नहीं चाहते थे, कारण चाहे जो रहा हो। देश के सर्वश्रेष्ठ स्पिनर्स में से एक होने के बाद भी मैं देश के लिए नहीं खेल सका, यह निराशा मृत्यु तक मेरे साथ रहेगी। 1980s में दो लेफ्ट आर्म स्पिनर रवि शास्त्री और दिलीप दोषी एक साथ खेले हैं, ऐसा विचार 1970s में क्यों नहीं किया गया, ये नहीं पता।” (सोर्स: Deccan Herald)

गोयल से पूछा गया कि इतने बढ़िया प्रदर्शन के बाद भी टीम में न चुने जाने पर उन्होंने लगातार खेलना जारी कैसे रखा तो उनका उत्तर था, “मैं बढ़िया गेंदबाजी करने के अतिरिक्त और कर भी क्या सकता था ? क्रिकेट मेरा जीवन है, पर जीवन में हमें सबकुछ नहीं मिलता। आपको बस अपना काम करते रहना है, मैंने भी अपनी क्षमताओं के हिसाब से सदैव अपना सर्वश्रेष्ठ करने का प्रयास किया।”

राजिंदर गोयल (पद्माकर शिवालकर के साथ) उन दो ऐसे खिलाड़ियों में से एक हैं जिन्होंने कभी टेस्ट क्रिकेट नहीं खेली परंतु सुनील गावस्कर उन्हें अपना आदर्श मानते हैं।

1958-59 में गोयल का प्रथम श्रेणी करियर पटियाला (बाद में इसे दक्षिणी पंजाब कहा गया) से आरम्भ हुआ। 1964-65 में गोयल ने श्रीलंका (तब इसे CEYLON कहा जाता था) के विरुद्ध एक Unofficial टेस्ट खेला था। 1958-59 से 1984-85 तक चले घरेलू करियर में गोयल ने दक्षिणी पंजाब, दिल्ली, हरियाणा के लिए रणजी ट्रॉफी और North Zone के लिए दलीप ट्रॉफी खेली।

(सोर्स: http://www.CricketCountry.Com ) 1962 में गोयल ने पंजाब छोड़कर दिल्ली के लिए खेलना आरम्भ किया। पहले ही सीजन में उन्होंने 25 विकेट लिए, उनकी इकॉनमी मात्र 1.49 रही। अपनी पुरानी टीम दक्षिणी पंजाब के विरुद्ध एक मैच में उनके आँकड़े थे, 31.4 ओवर में 24 मेडेन, 17 रन देकर 5 विकेट।अगले सीजन में उत्तरी पंजाब के विरुद्ध एक मैच में उनकी टक्कर थी बिशन सिंह बेदी से, गोयल इस मैच में भारी पड़े, उन्होंने इस मैच में 59 रन देकर 10 विकेट लिए। 1973-74 में गोयल ने हरियाणा से खेलना आरम्भ किया और पहले ही मैच में रेलवे के विरुद्ध 55 रन देकर 8 विकेट लिए। ये पहली बार था जब हरियाणा के किसी गेंदबाज ने पारी में 8 विकेट लिए थे।

1975-76 दलीप ट्रॉफी फाइनल में North Zone का मुकाबला था South Zone से। South Zone की ओर से खेल रहे थे भारत की प्रसिद्ध स्पिन चौकड़ी में से तीन स्पिनर… चंद्रशेखर, प्रसन्ना और वेंकट, और North Zone की ओर से खेल रहे थे, बेदी और गोयल। यह मैच स्पिन गेंदबाजों के बीच एक युद्ध था। पहली पारी में साउथ जोन ने 390 रन बनाए, नॉर्थ ज़ोन के लिए बेदी ने 1 और गोयल ने 7 विकेट लिए। नॉर्थ ज़ोन की पहली पारी 291 पर सिमटी, चंद्रशेखर ने 5, प्रसन्ना और वेंकट ने 2-2 विकेट लिए। साउथ ज़ोन ने दूसरी पारी में 134 रन बनाए, बेदी और गोयल ने 5-5 विकेट लिए। 234 रनों का पीछा करने उतरी नॉर्थ ज़ोन की टीम वेंकट के सामने टिक नहीं पाई और 196 पर निपट गई। वेंकट ने 5, प्रसन्ना और चन्द्रशेखर ने 2-2 विकेट लिए। (सोर्स: http://www.CricketCountry.Com )

गोयल के समय में हरियाणा की टीम तीन बार रणजी ट्रॉफी सेमीफाइनल में पहुँची पर हर बार वहीं से बाहर होना पड़ा। गोयल के सन्यास लेने के कई वर्ष बाद जब 1991 में कपिल देव के नेतृत्व में हरियाणा ने वानखेड़े स्टेडियम में मुम्बई को 2 रन से पराजित करके रणजी ट्रॉफी जीती तो गोयल उस टीम के मुख्य चयनकर्ता थे।

गोयल ने घरेलू क्रिकेट में 157 मैचों में 18.58 की औसत से कुल 750 विकेट लिए, 59 बार उन्होंने पारी में 5 विकेट और 18 बार मैच में दस विकेट लिए। गोयल के 750 में से 637 विकेट रणजी ट्रॉफी में आए, यह एक रिकॉर्ड है।

राजिंदर गोयल का कल 77 वर्ष की आयु में निधन हो गया। दिवंगत आत्मा को नमन।

ॐ शांतिः।

When Faf Du Plessis stood like a rock in Australia’s way

Cricket Australia ने पिछले 20 साल में ऑस्ट्रेलिया में सर्वश्रेष्ठ 20 बल्लेबाजी प्रदर्शन की सूची निकाली है।

इन 20 को चुनने का आधार जो क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने बताया है वो है… बॉलिंग अटैक की गुणवत्ता, परिस्तिथियाँ, स्ट्राइक रेट, कितने समय तक बल्लेबाजी की गई, व्यक्तिगत स्कोर टीम के स्कोर का कितना प्रतिशत रहा, बल्लेबाजी करने आए तब स्थिति क्या थी… इनके साथ साथ खिलाड़ी का पूर्व रिकॉर्ड और उस समय तक का उसका अनुभव, उसके व्यक्तिगत प्रदर्शन का मैच और सीरीज पर क्या प्रभाव रहा… यह सब ध्यान में रखने के बाद ये 20 परफॉर्मेंस क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने चुनी हैं।

इसमें एडिलेड में राहुल द्रविड़ के 233, एडिलेड में ही विराट कोहली के दोनों पारियों में शतक 115 & 141, सिडनी में सचिन के 241, एडिलेड में लारा के 226, एडिलेड में चेतेश्वर पुजारा के 123, सिडनी में लक्ष्मण के 167, मेलबर्न में सेहवाग के 195, पर्थ में 414 की रन चेज में डिविलियर्स के 106, केविन पीटरसन के एडिलेड में 227, मेलबर्न में JP डुमिनी ने 166, पर्थ में हाशिम आमला के 196, ब्रिस्बेन में एलेस्टर कुक के 235, होबार्ट में संगाकारा के 192 ये सब शामिल हैं।

Number 1 पर जिस प्रदर्शन को रखा गया है, वो है 2012 एडिलेड टेस्ट में फैफ डु प्लेसी के पहली पारी में 78 और दूसरी पारी में नॉट आउट 110 रन। किस प्रकार एक अनजान सा खिलाड़ी एडिलेड की गर्मी में 120 ओवरों से अधिक समय तक ऑस्ट्रेलिया को विजय से दूर किए रहा।

नवम्बर 2012 में एडिलेड में ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के बीच 3 टेस्ट की सीरीज का दूसरा टेस्ट खेला जा रहा था। (ब्रिस्बेन में पहला टेस्ट ड्रॉ हो चुका था।)

ऑस्ट्रेलियन कप्तान माइकल क्लार्क ने टॉस जीतकर बैटिंग चुनी और ऑस्ट्रेलिया ने पहले ही दिन दक्षिण अफ्रीका के स्टेन, मॉर्कल और इमरान ताहिर जैसे गेंदबाजों वाले आक्रमण का धागा खोल दिया। डेविड वॉर्नर ने मात्र 112 गेंद में 119 रन बना दिए। कप्तान माइकल क्लार्क का दोहरा शतक (230) उनका साल 2012 का चौथा और इस सीरीज का दूसरा दोहरा शतक था। इस पारी में क्लार्क का स्ट्राइक रेट 89 से भी अधिक था। माइकल क्लार्क को स्पिन के श्रेष्ठ बल्लेबाजों में से एक माना जाता था इसका अप्रतिम उदाहरण उन्होंने इस पारी में प्रस्तुत किया। (क्लार्क की यह पारी क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की इस सूची में 9वें स्थान पर है।) इमरान ताहिर को 23 ओवरों में 7.82 की औसत से 180 रन पड़े, बिना मेडेन और बिना किसी विकेट के। माइकल हसी ने भी बहती गंगा में हाथ धोया और 137 गेंद पर 103 बना दिए।

पहले दिन का खेल समाप्त होने पर ऑस्ट्रेलिया का स्कोर था 482/5, 86.5 ओवर में. ऑस्ट्रेलिया की पारी 550 पर खत्म हुई। जवाब में दक्षिण अफ्रीका ग्राएम स्मिथ के 122 और डुप्लेसी के 78 के बल पर 388 रन तक पहुँची। दूसरी पारी में ऑस्ट्रेलिया ने 268 रन बनाकर पारी घोषित की और दक्षिण अफ्रीका को चौथी पारी में 430 रनों का लक्ष्य दिया। अभी मैच में डेढ़ दिन शेष थे।

चार साल पहले दक्षिण अफ्रीका ने ऑस्ट्रेलिया में ही 414 रन चेज किए थे चौथी पारी में, लेकिन इस बार ऐसा कुछ होता दिख नहीं रहा था। पहली पारी में शतक बनाने वाले कप्तान ग्राएम स्मिथ 0 पर आउट हो गए और जल्द ही स्कोर हो गया 45/4.

अब क्रीज पर थे दो दोस्त, एब्राहम बेंजामिन डिविलियर्स और फैफ डुप्लेसी. मैच जीतने की कोई संभावना नहीं थी, इसलिए दोनों ने मैच ड्रॉ करने के लिए खेलना शुरु किया। चौथे दिन का खेल खत्म होने पर स्कोर था 77/4, 50 ओवर में। AB 12 और फैफ 19 पर खेल रहे थे। पाँचवे दिन हर कोई यह मानकर चल रहा था कि दक्षिण अफ्रीका मैच बचा नहीं सकती।

5वें दिन लंच तक का समय दोनों ने सुरक्षित निकाल दिया। इस दौरान अंपायर बिली बाउडेन ने माइकल क्लार्क की गेंद दो बार पर फैफ को LBW करार दिया पर फैफ ने DRS लिया और बच गए। पहली बार गेंद स्टम्प के बाहर पिच हुई थी और दूसरी बार तो पैड पर लगी ही नहीं थी। स्कोर था 85 ओवर में 126/4. फैफ 49 और AB 31.

Aussie कप्तान माइकल क्लार्क ने दूसरी नई गेंद 80 ओवर पूरे होते ही ले ली थी। उन्हें विकेट के लिए बहुत देर प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। 89वें ओवर में पीटर सिडल की एक गेंद पर AB के स्टम्प बिखेर गई। AB ने अपने 33 रनों के लिए 220 गेंदे खेली थीं। उनके जैसे आक्रामक बल्लेबाज द्वारा अपने स्टाइल के विपरीत खेलना टीम की आवश्यकता थी।

अब क्रीज पर आए जैक कैलिस.

फैफ ने 181 गेंदों में अपने 50 रन पूरे किए। दक्षिण अफ्रीका ने 200 रन 115वें ओवर में पूरे हुए। फैफ और कैलिस ने चायकाल तक का समय निकाल दिया। चायकाल के समय फैफ 94 पर थे और कैलिस 38 पर और स्कोर था 117 ओवर में 212/5. 94 पर ही उन्हें जीवनदान भी मिला जब तेज गेंदबाज बेन हिल्फ़ेनहाउस की गेंद पर विकेटकीपर मैथ्यू वेड ने फैफ का कैच छोड़ दिया। चाय के बाद फैफ ने 310 गेंदों पर अपना शतक पूरा किया। 129वें ओवर में जैक कैलिस 110 गेंद में 46 रन बनाकर आउट हो गए। अभी भी लगभग 20 ओवर का खेल शेष था और एकमात्र विशेषज्ञ बल्लेबाज फैफ शेष थे। डेल स्टेन ने 0 पर आउट होने से पहले 28 गेंदे खेली और लगभग 10 ओवर तक फैफ के साथ खड़े रहे। अभी भी दस ओवर का खेल बाकी था और मात्र 3 विकेट शेष थे। 8वाँ विकेट 144 वें ओवर में गिरा। साउथ अफ्रीकन ड्रेसिंग रूम की चिंताएँ चरम पर थीं, राहत की बात सिर्फ इतनी थी कि फैफ डुप्लेसी अभी भी क्रीज पर थे।

पारी का 148वाँ ओवर पीटर सिडल फेंक रहे थे। यह इस मैच का आखिरी ओवर था, मॉर्ने मॉर्कल ने इस ओवर की आखिरी गेंद को रोक लिया। फैफ 110 रन पर नॉट आउट थे, इसके लिए उन्होंने 376 गेंदों का सामना किया था। 21वें ओवर में बल्लेबाजी करने आए फैफ 148वें ओवर के अंत तक भी ऑस्ट्रेलिया और विजय के बीच एक पर्वत की तरह स्थित रहे। दक्षिण अफ्रीका की पारी के कुल ओवरों के 42% फैफ ने खेले थे। अपने डेब्यु टेस्ट में ऐसा प्रदर्शन वो भी ऑस्ट्रेलिया में, ये बहुत बड़ी बात थी।

इस मैच के बाद पीटर सिडल की एक फोटो जिसमें वो मैदान में सिर पकड़े बैठे हुए हैं, वह क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने अपनी वेबसाइट पर डाली है। सिडल ने इस पारी में 33 ओवर किए थे, 15 मेडेन और 65 रन देकर 4 विकेट। सिडल और अपने बीच संघर्ष का वर्णन करते हुए फैफ कहते हैं कि ये हाई स्कूल बार में चल रही लड़ाई की तरह था।

दक्षिण अफ्रीका ने पर्थ में तीसरा टेस्ट जीतकर सीरीज 1-0 से अपने नाम कर ली। पर्थ टेस्ट में हाशिम आमला की 196 रनों की पारी भी क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की इस सूची में है पर एडिलेड में फैफ डूप्लेसी के योगदान के बिना यह सीरीज विजय असंभव थी।

यही कारण है कि फैफ की यह पारी इस सूची में Number 1 पर है।

Rafael Nadal- The greatest competitor Tennis has ever seen.

टोनी नडाल ने अपने प्रिय भतीजे और शिष्य राफ़ा को बचपन से ही बताया था कि विम्बलडन टेनिस जगत का सबसे बड़ा टूर्नामेंट है और राफ़ा को यह जीतना ही है। 14 साल की उम्र से ही राफ़ा ने अपने दोस्तों से कहना शुरु कर दिया था कि एक दिन वह सेंटर कोर्ट पर खेलेगा और विम्बलडन जीतेगा।

2005 में राफेल नडाल ने फ्रेंच ओपन जीता। 2006 में वर्ल्ड नम्बर 1 रॉजर फेडरर को फ्रेंच ओपन फाइनल में हराकर करियर का दूसरा ग्रैंड स्लैम जीत लिया। महीने भर बाद वह सेंटर कोर्ट पर रॉजर फेडरर के सामने ही विम्बलडन फाइनल खेल रहे थे। विम्बलडन की घास पर रॉजर फेडरर का गेम फ्रेंच ओपन की लाल मिट्टी से बिल्कुल अलग था। उन्होंने नडाल को चार सेटों में हराकर अपना लगातार चौथा विम्बलडन जीत लिया। नडाल ने अपनी किताब “RAFA” में लिखा है कि इस हार का उन्हें को अधिक दुःख नहीं था। वे इस बात से संतुष्ट थे कि 20 वर्ष की उम्र में ही वे विम्बलडन में इतनी दूर तक पहुँचे थे। लेकिन 2007 में इसी सेंटर कोर्ट पर रॉजर फेडरर से पाँच सेटों में मिली पराजय ने उन्हें तोड़ दिया था। वे आधे घण्टे तक लॉकर रूम में रोते रहे।

“RAFA” में उन्होंने लिखा है कि इस मैच में पराजय का कारण उनकी क्षमता या उनके खेल की गुणवत्ता नहीं बल्कि उनका मस्तिष्क था। 5वें सेट में 5-2 के बाद 4 ब्रेक पॉइंट्स को न भुना पाना बहुत महँगा पड़ा। पाँचवें सेट में उनकी मानसिकता वही थी पहले सेट में होती है। नडाल ने यह माना कि यदि उन्होंने अंतिम सेट को पहले सेट की भाँति न खेलकर अंतिम सेट की भाँति खेला होता तो वे जीत सकते थे।

राफ़ा ने लिखा है उन्हें पता था कि एक प्रोफेशनल ऐथलीट का करियर कितना कम हो सकता है अतः वे एक स्वर्णिम अवसर गँवाकर बहुत दुःखी थे।

2006 और 2007 की तरह 2008 में भी राफ़ा ने फ्रेंच ओपन जीता और विम्बलडन फाइनल में पहुँचे। ये लगातार तीसरा वर्ष था जब रॉजर फेडरर और राफेल नडाल फ्रेंच ओपन और विम्बलडन के फाइनल में भिड़ रहे थे। पिछले दो फाइनल मैचों में रॉजर फेडरर फेवरेट माने गए थे। राफ़ा ने लिखा है, “This year I still felt I wasn’t the favorite. But there was a difference. I didn’t think that Federer was the favorite to win either.” राफ़ा ने अपनी आशाएँ 50-50 रखीं।

राफ़ा के अनुसार टेनिस अन्य खेलों की तुलना में मानसिक मजबूती की अधिक परीक्षा लेता है। जो खिलाड़ी मैच के दौरान होने वाले उतार चढ़ाव के बीच स्वयं को प्रेरित रखता है और पराजय के भय को स्वयं पर हावी नहीं होने देता, वह वर्ल्ड नम्बर 1 बनता है। पिछले तीन वर्षों से लगातार रैंकिंग में दूसरे स्थान पर चल रहे राफ़ा ने अपना लक्ष्य यही रखा था।

राफ़ा लिखते हैं कि उन्हें ये विचार आया करते थे कि वे कितने समय तक टेनिस के उच्चतम स्तर पर कम्पीट कर सकते हैं। यह भय सभी खिलाड़ियों को होता है, सिवाए रॉजर फेडरर के। रॉजर पैदा ही टेनिस खेलने के लिए हुए थे। उनकी शारीरिक रूप रेखा, उनका DNA ये सब टेनिस के लिए बना था। इस कारण उन्हें अन्य खिलाड़ियों की भाँति बड़ी इंजरी नहीं हुई। अन्य खेलों में भी इस प्रकार के खिलाड़ी होते हैं, जिनपर इंजरी के मामलों में दैव-कृपा अन्य से कुछ अधिक ही होती है। हालाँकि बड़ी इंजरी न होने के पीछे रॉजर फेडरर के खेलने का स्टाइल भी एक बड़ा कारण था और उनकी ट्रेनिंग भी।

अंकल टोनी ने राफ़ा को समझा दिया था कि प्रेशर आए भी तब भी गेम प्लान से हटना नहीं है। यदि लगातार 20 शॉट रॉजर के बैकहैंड पर खेलने हैं तो 20 ही खेलने हैं, 19 नहीं। कई बार ऐसा होगा जब एक विनिंग ड्राइव के 70% चांस होंगे, रैली में 5 शॉट और खेलने के बाद ये चांस 85% भी हो सकता है। अतः शीघ्रता नहीं करनी, दिमाग को स्थिर रखना है और उचित अवसर की प्रतीक्षा करनी है। “It means discipline, it means holding back when the temptation arises to go for broke.”

अगर नेट के पास जाएँ तो भूलकर भी रॉजर को ड्राइव करने के अवसर न दें जो उनका फेवरेट शॉट है। आप वो शॉट खेलें जिसे आप सबसे बढ़िया खेलते हैं और अपने प्रतिद्वंद्वी को वो शॉट खेलने पर विवश करें जो उसका सबसे कमजोर शॉट है। अर्थात राफ़ा की लेफ्ट हैंडेड ड्राइव रॉजर के राइट हैंडेड बैकहैंड की ओर। अंकल टोनी ने राफ़ा से कहा था कि टैलेंट के मामले में रॉजर फेडरर की बराबरी नहीं की जा सकती अतः उन्हें थकाना होगा। राफ़ा ने माना कि अंकल टोनी सही थे, रॉजर की Serve और Volley दोनों बेहतर थी, उनका फोरहैंड ज्यादा निर्णायक था, उनका बैकहैंड स्लाइस भी बेहतर था। किसी कारण से ही वो पिछले साढ़े चार साल से नम्बर एक थे और नडाल पिछले तीन साल से नम्बर दो।

अंकल टोनी के अनुसार एक ही उपाय था, वो यह कि फेडरर को मानसिक रूप से हराना होगा। एक एक पॉइंट के लिए उन्हें उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने पर विवश करना होगा। मैच में कई ऐसे अवसर आ सकते हैं जब रॉजर ऐसी लय में दिखेंगे कि लगेगा इस खिलाड़ी को कैसे पराजित किया जा सकता है। ऐसे में धैर्य नहीं खोना और विश्वास रखना है कि वे ऐसी लय पूरे मैच में कायम नहीं रख सकेंगे। समस्या यह थी कि थोड़ी देर में ही रॉजर ने दिखाना आरम्भ कर दिया कि क्यों वे विश्व के सर्वश्रेष्ठ टेनिस खिलाड़ी हैं। पहले सेट का तीसरा गेम जीतकर नडाल ने रॉजर की Serve ब्रेक कर दी। अभीतक इस पूरे टूर्नामेंट में रॉजर की Serve सिर्फ दो बार ब्रेक हुई थी। यह तीसरा अवसर था। नडाल ने इसके बाद अपनी सभी Serve होल्ड की और पहला सेट 6-4 से जीत लिया।

दूसरे सेट के पहले ही गेम में रॉजर ने नडाल की Serve ब्रेक कर दी और जल्दी ही डबल ब्रेक करके 4-1 की लीड ले ली। नडाल ने लिखा है कि जब रॉजर फेडरर इस प्रकार का खेल दिखा रहे होते हैं तो आप एक ही काम कर सकते हैं, इस तूफान के शान्त होने का इंतज़ार। बिना हिम्मत गँवाए यह विश्वास रखना होगा कि रॉजर इस तरह का खेल पूरे मैच में नहीं दिखा सकते। हुआ भी यही, यह तूफान थमा और इसके लिए पूरी तरह से तैयार राफ़ा ने शीघ्र ही 4-4 से बराबरी कर ली। अब इस सेट में भी राफ़ा का पलड़ा भारी होने लगा था। 5-4 की लीड के बाद राफ़ा इस सेट के लिए Serve कर रहे थे। यह गेम दो बार Deuce (40-40) तक गया। तीन ब्रेक पॉइंट गँवाने के बाद रॉजर का एक बैकहैंड नेट में जा लगा और नडाल ने दूसरा सेट भी 6-4 से जीत लिया। अब वे अपने जीवन का सबसे बड़ा मैच जीतने से मात्र एक सेट दूर थे पर ये इतना आसान भी नहीं था। नडाल के अनुसार दूसरे सेट में 6-4 का स्कोर इस सेट में फेडरर के प्रदर्शन से न्याय नहीं कर रहा था, फेडरर ने इस सेट में अपने प्रतिद्वंद्वी से बेहतर खेल दिखाया था।

राफ़ा ने लिखा है, “The scoreboard said I was two sets to love up; but in my mind it was still 0–0.” राफ़ा का यह विचार गलत नहीं था। रॉजर फेडरर ने शानदार वापसी करते हुए अगले दोनों सेट 7-6, 7-6 से टाई ब्रेकर में जीते।

“RAFA” में नडाल के साथी लेखक John Carlin बताते हैं कि जब RAFA मैच से पहले मसाज टेबल से उठता है फिर फिजियो से आवश्यक बैंडेज लगवाने के बाद माथे पर Bandanna बाँधता है और स्ट्रेचिंग के बाद मानो सिंहनाद कर रहा हो, ‘Vamos! Vamos!’ [‘Let’s go! Let’s go!’]. इस समय वह योद्धा की भाँति शोभायमान होता है। लॉकर रूम में यह दृश्य देखकर उसके प्रतिद्वंद्वी भयभीत हो सकते हैं और सोच में पड़ सकते हैं, “Oh, my God! This is Nadal, who fights for every point as if it were his last. Today I’m going to have to be at the very top of my game, I’m going to have to have the day of my life. And not to win, just to have a chance.” John Carlin आगे लिखते हैं, रॉजर फेडरर पर इन बातों का कोई प्रभाव नहीं था, निश्चित ही वह पत्थर के बने हैं।

चौथे सेट के टाईब्रेकर में सेंटर कोर्ट का क्राउड दो हिस्सों में बँट गया था, आधे लोग “Roger Roger” और आधे ही “Rafa Rafa” चिल्ला रहे थे। इस टाई ब्रेकर में नडाल ने 5-2 की बढ़त ले ली थी। वे विम्बलडन चैंपियन बनने से मात्र 2 पॉइंट दूर थे, पर जैसा 2007 वाले फाइनल में हुआ था, बात वही हुई, नडाल Nerves को नियंत्रित रखने का संघर्ष कर रहे थे। अगले दो शॉट्स कहाँ खेलने हैं इन विचारों ने उन्हें परेशान कर रखा था। नडाल ने लिखा है कि उन्हें इतना सोचना ही नहीं चाहिए था। जैसे ही उन्होंने Serve के लिए गेंद उछाली, उनके दिमाग में “Double fault Danger, don’t blow it” कौंध रहा था, हुआ भी Double Fault ही, उनकी 2nd Serve नेट में जा लगी।

“Fear of losing” के बारे में तो नडाल को पहले से पता था। आज पहली बार उन्हें पता चल रहा था कि “Fear of winning” क्या चीज़ है। Fear of Winning के बारे में नडाल ने कहा है कि यह वो स्थिति है जब आपको पता होता है कि आपको कौन सा शॉट खेलना है, पर आपका दिमाग और पैर साथ नहीं देते। Nerves उनपर हावी थी। यह Fear of losing नहीं था, क्योंकि मैच में एक बार भी नडाल को ऐसा नहीं लगा था कि वे यह मैच नहीं जीत सकते।

अब यह टाईब्रेकर 5-5 ही चुका था। राफ़ा सोच रहे थे भले ही उन्होंने कई अवसर गँवा दिए हैं इस मैच को जीतने के लेकिन अभी भी दो लगातार पॉइंट उन्हें विम्बल्डन चैम्पियन बना सकते हैं। Fear Of Winning उनके दिमाग से निकल चुका था। अब वो ऐसी स्थिति में थे, जिसकी उन्हें पहले से आदत थी, “Battling for the set.” स्कोर 7-7 फिर 8-7. राफेल नडाल के पास मैच पॉइंट था वो भी अपनी Serve पर, तभी आया रॉजर का एक जोरदार बैकहैंड और स्कोर 8-8. इससे अगला पॉइंट जीतकर फेडरर ने इस टाईब्रेकर में 9-8 की बढ़त ले ली थी। जो रॉजर फेडरर पहले दो सेट हार चुके थे, वो अब लगातार दो सेट जीतकर यह मैच बराबर करने से मात्र एक पॉइंट दूर थे। फेडरर की Serve को नडाल ठीक बसे रिटर्न नहीं कर पाए और 10-8 से यह टाईब्रेकर जीतकर रॉजर फेडरर ने मैच बराबर कर दिया। इस बात से दर्शक बड़े प्रसन्न थे। कोई नहीं चाहता था कि ये मैच खत्म हो। सभी पाँचवाँ सेट देखना चाहते थे।

पाँचवाँ सेट- राफेल नडाल ने चौथे सेट में विम्बलडन चैंपियन बनने का अवसर गँवा दिया था और उनके लिए इससे भी चिंता की बात यह थी कि रॉजर फेडरर पाँचवें और निर्णायक सेट में पहले Serve कर रहे थे। नडाल को बताया गया था कि सेट के पहले ही गेम में प्रतिद्वंद्वी की Serve ब्रेक करने से अधिक अगले गेम में अपनी Serve होल्ड करने पर अधिक ध्यान देना चाहिए, क्योंकि अपनी Serve होल्ड न की तो अगले गेम में सेट का स्कोर 0-3 हो सकता है और यहाँ से सेट बचा पाना बहुत कठिन हो जाता है। इस मैच के पिछले 25 गेम में दोनों में से किसी खिलाड़ी ने अपनी Serve होल्ड की थी। इस सेट के पहले 6 गेम में भी यही हुआ, सेट का स्कोर था 3-3. सातवाँ गेम जीतकर रॉजर ने 4-3 की बढ़त ले ली। पाँचवें सेट में टाई ब्रेकर नहीं होते थे, अतः चैंपियन बनने के लिए प्रतिद्वंद्वी की Serve ब्रेक करनी तो अनिवार्य थी।

जब नडाल ने मैच के पहले दो सेट जीत लिए थे तो बहुत कम लोगों ने यह सोचा होगा कि मैच इस मोड़ तक आएगा। रॉजर फेडरर यदि यहाँ नडाल की Serve ब्रेक कर देते तो अगले गेम में इस सेट और विम्बलडन चैंपियनशिप के लिए Serve करते। आठवें गेम में रॉजर 40-30 से आगे थे और उनके पास एक ब्रेक पॉइंट था। नडाल ने कहा है कि इस ब्रेक पॉइंट को बचाने के लिए उन्होंने अपना सारा अनुभव और सामर्थ्य झोंक दिया और यह पॉइंट बचा लिया। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि इस समय उनके मन में विचार आया, “Concentrate every gram of energy and every cell in your brain and everything you’ve ever done in your life into holding this next point.”

10 गेम के बाद सेट का स्कोर 5-5 होने के बाद 11वें गेम में फेडरर Serve कर रहे थे और 15-40 से आगे थे। दो ब्रेक पॉइंट थे, लेकिन फेडरर की एक Ace और उसके बाद एक और काफी ताकतवर Serve. फेडरर ने ये गेम भी होल्ड किया। तीसरे सेट में 40-0 के बाद ब्रेक न कर पाना, चौथे में टाईब्रेकर में 5-2 की लीड के बाद सेट गँवा देना और अब पाँचवें सेट में दो ब्रेक पॉइंट गँवा देना। नडाल के लिए इस मैच की कहानी गँवाए हुए अवसरों की थी।

थोड़ी देर बाद पाँचवें सेट का स्कोर था 7-7. 15वें गेम में रॉजर serve कर रहे थे। 15-40 के बाद नडाल को फिर से दो ब्रेक पॉइंट मिले, फिर वही हुआ जो 11वें गेम में हुआ था। रॉजर फेडरर की एक Ace और इसके बाद एक ताकतवर Serve. फिर से Deuce (40-40) लेकिन तभी रॉजर फेडरर ने अपनी फोरहैंड पर लगातार दो Unforced Errors किए जिसके परिणामस्वरूप नडाल ने यह गेम जीत लिया और घंटों बाद रॉजर फेडरर की Serve ब्रेक हो गई।

पाँचवें सेट में 15वें गेम के बाद पहली बार राफेल नडाल विम्बलडन चैंपियनशिप के लिए Serve कर रहे थे। रॉजर फेडरर को हराने से पहले नडाल को स्वयं को हराना था।

40-30 से लीड करने के बाद राफेल नडाल के पास इस मैच का तीसरा मैच पॉइंट था। नडाल ने लिखा हैं, नडाल ने रॉजर के बैकहैंड की ओर एक तेज Serve की, जिसपर फेडरर की रिटर्न इतनी जोरदार थी कि नडाल उसे स्पर्श तक न कर सके। फिर से Deuce (40-40)। नडाल ने लिखा है, “This was Roger Federer, the greatest player of all time, and this was why, even now, no thought of victory, no suggestion of complacency, was allowed.”

राफेल नडाल को मैच का अबतक का सबसे बढ़िया आइडिया आया। अभीतक उनका प्रयास रॉजर के बैकहैंड की ओर Serve करने का रहा था। इस बार उन्होंने रॉजर के फोरहैंड की ओर एक बेहद तेज Serve की, फेडरर पूरा प्रयास करने के बाद भी उसे केवल रैकेट के बाहरी हिस्से से स्पर्श कर पाए। मैच का चौथा मैच पॉइंट राफेल नडाल के पास था। नडाल Serve करने में थोड़ा झिझके, कुछ मिनट पहले उनकी Serve पर रॉजर का बैकहैंड विनर उन्हें याद था। इस बार उन्होंने रॉजर के शरीर को टारगेट किया और Serve की। निशाना सही नहीं था और गेंद रॉजर के फोरहैंड की ओर थी, पर उनकी रिटर्न सही नहीं थी, उसमें ताकत नहीं थी। नडाल को आसान मौका मिला पर उनका शॉट भी अच्छा नहीं लगा। गेंद कोर्ट के बीच में गिरी। रॉजर आगे बढ़े पर उनका शॉट सीधा नेट के बीच में जा लगा।

नेट के उस पार राफेल नडाल सेंटर कोर्ट की घास पर लेट गए, दोनों मुट्ठियाँ बंदकर, दोनों भुजाएँ उठाकर उन्होंने विजय का उद्घोष किया। Fear of losing, Fear of Winning, Frustration, निराशा, मैच के बाद लॉकर रूम के शावर में फूट फूटकर रोने का भय, इन सब पर राफ़ा ने विजय प्राप्त कर ली थी। मैच का फाइनल स्कोर था 6-4, 6-4, 6-7, 6-7, 9-7. टोनी नडाल का सपना पूरा हो चुका था, उनका भतीजा और शिष्य आज विम्बलडन चैंपियन था और रैंकिंग में नम्बर 1 का स्थान रॉजर फेडरर से लेने वाला था।

राफेल नडाल ने अपने करियर में अबतक 19 ग्रैंड स्लैम, एक ओलंपिक स्वर्ण पदक (2008 बीजिंग) और 35 Masters 1000 टूर्नामेंट जीते हैं। 12 बार उन्होंने फ्रेंच ओपन जीता, ये रिकॉर्ड शायद ही कभी टूटे। जिन लोगों को लगता है कि नडाल केवल क्ले कोर्ट के खिलाड़ी हैं, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उन्होंने 7 ग्रैंड स्लैम दूसरे कोर्ट्स पर भी जीते हैं, John McEnroe जैसे महान खिलाड़ी ने 7 ग्रैंड स्लैम अपने पूरे करियर में जीते थे।

यह टेनिस का Warrior है। अनेकों इंजरी के बाद वापसी करना और उसके बाद भी टेनिस जैसे स्पोर्ट में (जिसमें फिजिकल फिटनेस की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है) टूर्नामेंट पर टूर्नामेंट जीतना सबके बस की बात नहीं होती।

Rafael Nadal को जन्मदिन की शुभकामनाएँ।

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