चेन्नई टेस्ट पर चर्चा करने से पूर्व डेमियन मार्टिन पर बात करना आवश्यक है।
डेमियन मार्टिन भी अपने समय के माइकल क्लार्क थे। उनका टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण भी अल्पायु में हुआ था (मात्र 21 वर्ष में)। उन्हें भी ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट का भविष्य कहा जा रहा था परंतु उनके करियर का आरंभ माइकल क्लार्क की भाँति नहीं हुआ था। 1992-93 में वेस्ट इंडीज़ के विरुद्ध उन्होंने अपने टेस्ट करियर का आरंभ किया था और शृंखला के 4 टेस्ट में मात्र 169 रन बनाए।
1993-94 में दक्षिण अफ्रीका ऑस्ट्रेलिया दौरे पर आई तो स्टीव वॉ की चोट के कारण मार्टिन को एकादश में स्थान मिला। मेलबर्न में पहला टेस्ट वर्षा के कारण बराबर रहा और सिडनी में दूसरे टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया चौथी पारी में दक्षिण अफ्रीका के सामने 117 रनों के लक्ष्य का पीछा कर रही थी। चौथे दिन का खेल समाप्त होने तक ऑस्ट्रेलिया ने 4 विकेट पर 63 रन बना लिए थे। अंतिम दिन ऑस्ट्रेलिया ने मात्र 12 रन पर 4 विकेट और गँवा दिए और स्कोर 75 पर 8 हो गया।
क्रमांक 10 पर आए तेज गेंदबाज क्रेग मैक़्डर्मट। मैक़्डर्मट क्रमांक 10 केवल इसलिए थे क्योंकि क्रमांक 11 अब ग्लेन मक्ग्रा ने हथिया लिया था जो निश्चित रूप से उनसे घटिया बल्लेबाज़ थे। पर आज के दिन मैक़्डर्मट एक बल्लेबाज की भाँति खेल रहे थे। उन्होंने ऐलन डॉनल्ड और फैनी डिविलियर्स को चार चौके लगाकर स्कोर को 110 तक पहुँचाया। मात्र 7 रन चाहिए थे विजय के लिए, रन बनाने का दायित्व मैक़्डर्मट ने अपने ऊपर लिया हुआ था। अबतक 35 की साझेदारी में 29 रन बनाने वाले मैक़्डर्मट इस प्रकार खेल रहे थे मानो बस स्ट्राइक मिलते ही विजय दिला देंगे। कहने को दो विकेट शेष थे पर नम्बर 11 ग्लेन मक्ग्रा से ऐसी स्थिति में एक रन बनाने की आशा रखना भी समझदारी नहीं थी।
डेमियन मार्टिन एकमात्र विशेषज्ञ बल्लेबाज शेष थे, पहली पारी में उन्होंने 59 रन बनाए थे पर दूसरी पारी में एक एक रन के लिए संघर्ष कर रहे थे। वे टीम के सबसे युवा सदस्य थे पर आज अबतक सबसे अधिक साहस उन्होंने ही दिखाया था। उन्होंने आज सुबह 4 अनुभवी खिलाड़ियों के विकेट गिरते देखे थे पर वे डटे हुए थे। अब अधिक देर का संघर्ष शेष नहीं था। इस बात से कोई अंतर पड़ने वाला नहीं था कि उन्होंने अबतक लगभग 2 घण्टे बल्लेबाजी करके 58 गेंदों में 6 रन बनाए थे। उन्हें बस थोड़ी देर और खड़ा रहना था।
“But sometimes the brink is a precipice.” ऑस्ट्रेलिया विजयद्वार पर खड़ी थी। मार्टिन स्वभाव से एक आक्रामक बल्लेबाज थे पर आज उन्होंने स्वयं पर बहुत नियंत्रण रखा था। उन्हें ऐलन डॉनल्ड की एक गेंद हाफ वॉली लगी। मार्टिन ने अपना स्वाभाविक खेल खेला और ड्राइव के लिए गए पर ये हाफ वॉली नहीं थी, मार्टिन गेंद की पिच तक नहीं पहुँचे थे पर उनका बल्ला चल चुका था। सम्पर्क ठीक नहीं हुआ और गेंद एक्सट्रा कवर पर खड़े ऐन्ड्रू हडसन के सुरक्षित हाथों में चली गयी।
ग्लेन मक्ग्रा मात्र 1 रन बनाकर फैनी डिविलियर्स को रिटर्न कैच दे बैठे, क्रेग मैक़्डर्मट दूसरे छोर पर 29 पर खड़े रह गए और दक्षिण अफ्रीका ने यह मैच 5 रनों से जीत लिया। [ऐडिलेड टेस्ट में स्टीव वॉ वापस आए और उनकी 164 रनों की पारी के बलपर ऑस्ट्रेलिया ने टेस्ट जीतकर शृंखला 1-1 से बराबर की।]
जहाँ टेस्ट मैच दाँव पर लगा हो वहाँ ऑस्ट्रेलियाई टीम में ऐसी लापरवाही और अनुशासनहीनता स्वीकार्य नहीं थी। इस एक अनावश्यक शॉट ने डेमियन मार्टिन का टेस्ट करियर 7 वर्ष छोटा कर दिया। मार्टिन को इस पराजय का ऐसा दंड मिलना चाहिए था या नहीं उसपर आप विचार करें। क्या वे पराजय के लिए अकेले उत्तरदायी थे?
“History reserves it’s strongest condemnation for great talent frittered away” – मार्टिन जैसी नैसर्गिक प्रतिभा वाले बल्लेबाज बहुत कम देखने को मिले हैं। जो कठिन शॉट को भी इस प्रकार खेल सकते थे जो देखने वाले को ऐसा लगे कि यह तो बड़ा सरल है।
मार्टिन का दुर्भाग्य यह नहीं था कि उन्होंने यह शॉट खेला प्रत्युत उनके खेलने की शैली ऐसी थी कि ऐसा लगा मानो उन्होंने इस बात की चिंता नहीं की कि ऑस्ट्रेलिया को मात्र 7 रन चाहिए। उन्होंने बॉर्डर, मार्क वॉ, इयन हीली और शेन वॉर्न अपने सामने आउट होकर लौटते देखा था और टीम को लक्ष्य के इतना निकट तक पहुँचाने में उनसे अधिक श्रम किया था परन्तु इस एक शॉट के कारण यह बात किसी को याद नहीं रहनेवाली थी।
मार्टिन को अगला टेस्ट खेलने का अवसर लगभग 7 वर्ष बाद 29 वर्ष की आयु में नवम्बर 2000 में मिला। अबकी बार उन्होंने अपना स्थान सुनिश्चित कर किया और इसके बाद टीम का हिस्सा बने रहे।
2001 में भी भारत में हुई शृंखला हेतु उन्हें टीम में रखा गया था पर रिकी पॉन्टिंग की लगातार खराब फॉर्म के बाद भी एकादश में स्थान नहीं मिला था।
2004 में वे ऑस्ट्रेलियाई मध्यक्रम के सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ सिद्ध होने वाले थे। अबतक इस शृंखला में उन्होंने कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं किया था। चेन्नई में टेस्ट का तीसरा ही दिन था और दूसरी पारी में उनकी टीम संकट में थी। अभी भी 20 रन की बढ़त उतारनी थी और तीन प्रमुख बल्लेबाज पवेलियन लौट चुके थे। ऑस्ट्रेलिया को आवश्यकता थी एक नायक की, जो उसे मार्टिन के रूप में मिला।
चलते हैं 3 दिन पूर्व चेन्नई टेस्ट के पहले दिन:
1-0 की बढ़त के साथ ऑस्ट्रेलिया चेन्नई पहुँची। 2001 वाली शृंखला में भी ऑस्ट्रेलियाई टीम के पास 1-0 की बढ़त थी पर अगले दोनों टेस्ट गँवाकर वह शृंखला 1-2 से हार गई थी।
चेन्नई में भारत ने ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध पिछले दोनों टेस्ट मैच (1998 और 2001) जीते थे। भारतीय टीम को 2004 में भी ऐसे ही परिणाम की अपेक्षा थी। चिंता की बात यह थी कि उन दोनों मैचों में शतक लगाने वाले सचिन तेंदुलकर चोट के कारण एकादश में नहीं थे।
Australia off to a flier:
ऐडम गिलक्रिस्ट ने पुनः टॉस जीता और बल्लेबाजी का निर्णय लिया और उनके आरंभिक बल्लेबाजों मैथ्यू हेडन और जस्टिन लैंगर ने इस निर्णय को उचित सिद्ध किया। मैथ्यू हेडन ने 2001 चेन्नई टेस्ट में दोहरा शतक लगाया था, 2004 में भी वे वैसा ही प्रदर्शन दोहराने को तैयार लग रहे थे। प्रथम सत्र में कोई विकेट नहीं गिरा और 111 रन बन गए थे। दोनों बल्लेबाज अपने अर्धशतक बना चुके थे और साढ़े चार की औसत से रन बना रहे थे। कप्तान सौरव गांगुली को पहले ही सत्र में सीमारेखा पर क्षेत्ररक्षक लगाने को विवश होना पड़ा था। भोजनावकाश के बाद मैथ्यू हेडन ने हरभजन सिंह की गेंद पर आगे निकलकर छक्का लगाना चाहा। वे अबतक दो छक्के लगा चुके थे पर इस बार सम्पर्क सही नहीं हुआ और गेंद लॉन्ग ऑफ पर लक्ष्मण के हाथों में चली गयी। दो गेंद बाद हरभजन ने लैंगर को स्लिप में द्रविड़ के हाथों कैच कराया और मैच में भारतीय टीम की वापसी करा दी।
Jumbo: चायकाल से ठीक पूर्व अनिल कुंबले ने डेमियन मार्टिन को फॉरवर्ड शॉर्ट लेग पर कैच कराके तीसरे विकेट के लिए 53 रनों की साझेदारी का अंत किया। चायकाल के बाद तो कुंबले ने मानो लाइन लगा दी। उन्होंने पारी में 7 विकेट लिए ऑस्ट्रेलिया मात्र 235 रनों पर सिमट गयी। (अंतिम 8 विकेट मात्र 46 रनों पर) अनिल कुंबले ने 17.3 ओवर में 48 रन देकर 7 विकेट लिए।
आकाश चोपड़ा को एकादश में स्थान नहीं मिला था, उनके स्थान पर मोहम्मद कैफ को अवसर मिला था। वीरेंद्र सहवाग के साथ उतरे युवराज सिंह जो 40 गेंदों तक संघर्ष करते रहे और इस संघर्ष का अंत किया शेन वॉर्न ने, जब उनकी गेंद युवराज के बल्ले का किनारा लेती हुई गिलक्रिस्ट के पैरों में फँस गयी।
The Virender Sehwag Show:
वीरेंद्र सेहवाग ने 2003 बॉक्सिंग डे टेस्ट में मेलबर्न में 195 रनों की पारी खेली थी। चेन्नई टेस्ट के दूसरे दिन टीम को उनसे ऐसी ही पारी की आवश्यकता थी। गिलेस्पी को स्क्वेयर लेग पर चौका लगाकर उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में अपने 2 हज़ार रन पूरे किए। पहले दिन रात्रि प्रहरी के रूप में आए इरफान पठान ने एक छोर संभाला हुआ था और रन बनाने का दायित्व सेहवाग पर था। शेन वॉर्न को स्वीप करके उन्होंने अपना अर्धशतक पूर्ण किया। यह उनका 9वाँ चौका था। भोजनावकाश से कुछ ओवर पूर्व इरफान आउट हुए और राहुल द्रविड़ क्रीज पर आए।
इस साझेदारी में द्रविड़ की भूमिका भी वही थी जो पिछली साझेदारी में इरफान की थी, बस एक छोर पर खड़े रहो और “वीरेन्द्र सेहवाग शो” का आनंद लो, क्योंकि कोई भी वीरेंद्र सेहवाग की तरह टेस्ट नहीं खेल सकता। सेहवाग जब लय में होते हैं तो उनके साथी बल्लेबाज की भूमिका यही होती है, चाहे वह मेलबर्न या लाहौर में राहुल द्रविड़ हों या मुल्तान में सचिन तेंदुलकर हों। (अब इस बात पर कोई धनुष पर प्रत्यंचा न चढ़ा ले कि मुल्तान में सचिन ने 194* और लाहौर में द्रविड़ ने 128* बनाए थे, यहाँ बस साझेदारी में वीरू के आक्रामक होने की बात हो रही है।)
56वें ओवर में माइकल कैस्प्रोविच की गेंद को बैकवर्ड पॉइंट सीमारेखा के बाहर भेजकर सेहवाग 99 पर पहुँचे और तीन गेंद बाद ही एक्स्ट्रा कवर पर चौका लगाकर उन्होंने अपना 7वाँ टेस्ट शतक पूरा किया। (इस समय टीम का स्कोर था 160 रन।)

Middle order struggles:
चायकाल से पहले राहुल द्रविड़ 26 रन बनाकर आउट हुए। ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध पिछली दोनों शृंखलाओं में अविस्मरणीय प्रदर्शन करने वाले राहुल द्रविड़ का लगातार दूसरे टेस्ट में असफल होना चिंताजनक था।
क्रीज पर द्रविड़ की जगह ली कप्तान सौरव गांगुली ने। 2001 वाली शृंखला भारत ने उनकी कप्तानी में जीती थी पर उसमें वे 6 पारियों में मात्र 106 रन बना सके थे। वे बैंगलोर टेस्ट में हुए पिछले टेस्ट में भी प्रभावी नहीं लगे थे। कप्तान की फॉर्म भारतीय टीम के लिए चिंता का विषय थी। आज भाग्य भी उनका साथ दे रहा था, इसके बाद भी वे इसका लाभ नहीं उठा सके। शून्य के स्कोर पर माइकल कैस्प्रोविच की गेंद पर वे तीसरी स्लिप में कैच हुए पर अम्पायर रूडी कोर्टजन ने नो बॉल का संकेत दिया। कुछ समय बाद कैस्प्रोविच की ही गेंद पर गिलक्रिस्ट ने उनका सरल सा कैच छोड़ दिया था। जेसन गिलेस्पी ने क्रीज पर उनके 29 गेंदों तक चले संघर्षपूर्ण प्रवास का अंत किया। कप्तान मात्र 9 रन बना सके। राहुल द्रविड़ की तरह पिछली दोनों शृंखलाओं के नायक रहे वीवीएस लक्ष्मण भी अधिक देर नहीं टिके और जेसन गिलेस्पी ने उनका ऑफ स्टम्प उड़ा दिया।
विकेटों के पतन के बीच वीरेंद्र सेहवाग दूसरे छोर पर अपने काम में लगे हुए थे। वे अपने डेढ़ सौ रन पूरे कर चुके थे। भारत अब ऑस्ट्रेलिया के स्कोर से मात्र 2 रन पीछे था। यह सर्वविदित था कि वीरेन्द्र सेहवाग अच्छी से अच्छी गेंद पर चौका लगा सकते हैं पर घटिया से घटिया गेंद पर विकेट भी दे सकते हैं। हुआ भी यही। जिस प्रकार सेहवाग मेलबर्न में 195 बनाने के बाद साइमन कैटिच की फुलटॉस पर आउट हुए थे, कुछ उसी प्रकार चेन्नई में भी उन्होंने 155 बनाने के बाद शेन वॉर्न की एक शॉर्ट गेंद को मिडविकेट सीमारेखा से थोड़ा अंदर खड़े माइकल क्लार्क के हाथों में भेज दिया। सेहवाग भारतीय टीम के कुल स्कोर का दो तिहाई अकेले बनाकर पवेलियन लौट रहे थे।
भारत को इस पिच पर चौथी पारी खेलनी थी अतः एक बड़ी बढ़त आवश्यक थी पर सारे बड़े नाम वापस लौट चुके थे। यहाँ बढ़त दिलाने का दायित्व उठाया चोट के बाद वापसी कर रहे युवा बल्लेबाज मोहम्मद कैफ और विकेटकीपर पार्थव पटेल ने। दोनों ने अर्धशतक बनाए और 40 ओवरों में 102 रनों की साझेदारी की। भारतीय पारी 141 रनों की बढ़त के साथ 376 पर समाप्त हुई।
अनिल कुंबले ने दोनों आरंभिक बल्लेबाजों को आउट किया और जब साइमन कैटिच इरफान पठान की गेंद पर आउट हुए तब ऑस्ट्रेलिया 20 रन पीछे थी। क्रीज पर आए डेमियन मार्टिन।

तीसरे दिन का खेल समाप्त होने से ठीक पूर्व अनिल कुंबले ने ऐडम गिलक्रिस्ट को 49 के स्कोर पर बोल्ड कर दिया और रात्रि प्रहरी के रूप में आए जेसन गिलेस्पी। यह अनिल कुंबले का मैच में 10वाँ विकेट था। टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने 6ठी बार मैच में 10 विकेट पूरे किए थे। दिन का खेल समाप्त होने पर ऑस्ट्रेलिया का स्कोर था 49 ओवर में 150/4.
Martyn Masterclass:
चौथे दिन के पहले घण्टे में मार्टिन और गिलेस्पी केवल भागकर ही रन लिए। मार्टिन ने कुंबले की शॉर्ट गेंद पर पुल करके स्क्वेयर लेग क्षेत्र में दिन का पहला चौका प्राप्त किया। पारी के 73वें ओवर में हरभजन की शॉर्ट गेंदों पर मिडविकेट क्षेत्र में लगातार दो चौका लगाकर मार्टिन ने अपना 18वाँ अर्धशतक पूरा कर लिया और भोजनावकाश तक ऑस्ट्रेलिया का एक भी विकेट नहीं गिरने दिया। जेसन गिलेस्पी आए तो रात्रि प्रहरी की भूमिका में थे परंतु उन्होंने आज एक छोर सम्भाले रखा था।

गेंद रफ में गिरने के बाद कितना उछलेगी इसका अनुमान लगाना कठिन था अतः मार्टिन अधिकतर बैकफुट पर ही खेल रहे थे। पिछली पारी में कुंबले की गेंद को फ्रंट फुट पर खेलने के प्रयास में वो शॉर्ट लेग पर कैच हो गए थे।

भोजनावकाश के बाद सौरव गांगुली ने नई गेंद ले ली। इरफान पठान को पॉइंट पर चौका लगाकर मार्टिन ने इस साझेदारी के सौ रन पूरे कर लिए। बढ़त भी सौ से अधिक हो गयी थी जो सौरव के लिए चिंता का विषय बनती जा रही थी। मार्टिन अब रफ में गिर रही गेंदों पर स्वीप खेलने का विचार किया था। इसी शॉट द्वारा हरभजन सिंह को लगातार दो चौके लगाकर वे 90 के पार पहुँच गए।

One of the finest test hundreds vs India: पारी के 100वें ओवर कुंबले की पहली पाँच गेंदों को मार्टिन के रक्षात्मक ढंग से खेला और अंतिम गेंद को आगे निकलकर सीधा उठा दिया। अम्पायर डेविड शेफर्ड के दोनों हाथ ऊपर। टेस्ट क्रिकेट में मार्टिन का यह 8वाँ और भारत के विरुद्ध पहला शतक था। शतक के तत्काल बाद ही हरभजन की गेंद पर वे स्लिप में कैच दे बैठे। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया को न केवल संकट से उबारा था बल्कि चौथी पारी में भारत के लिए बड़ा लक्ष्य प्राप्त करने की ओर अग्रसर कर दिया था। 43-44 डिग्री की गर्मी में स्पिन के लिए आदर्श परिस्थितियों पिच पर विश्व क्रिकेट के दो श्रेष्ठ स्पिन गेंदबाजों के विरुद्ध मार्टिन की यह पारी ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट इतिहास की अविस्मरणीय पारियों में से एक है। 4 घंटे से खेल रहे गिलेस्पी भी मानो मार्टिन के साथ देने के लिए ही रुके हुए थे, वे भी इसी ओवर में स्लिप में ही कैच हुए। स्कोर 285/6, ऑस्ट्रेलिया की बढ़त 144 रन।

माइकल क्लार्क और डैरेन लीमन (31) के बीच 62 रनों की साझेदारी हुई। दिन का खेल समाप्त होने से कुछ मिनट पूर्व ऑस्ट्रेलियाई पारी 369 रनों पर समाप्त हुई। क्लार्क 39 पर अविजित रहे। अनिल कुंबले ने पारी में 6 विकेट लिए (मैच में 13)। आज उनका जन्मदिन भी था।
229 रनों के लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय टीम ने 3 ओवरों में 19 रन बनाए। दोनों आरंभिक बल्लेबाज सेहवाग और युवराज अविजित लौटे।
चौथी पारी में इस पिच पर 200 से अधिक का लक्ष्य प्राप्त करना बहुत कठिन था। वह भी तब जब पिच पर पिच पर रफ बन चुके थे और शेन वॉर्न लय में थे। निश्चित रूप से पलड़ा ऑस्ट्रेलिया का ही भारी था पर भारतीय टीम भी मैच से बाहर नहीं थी। मैच का परिणाम क्या रहा होता इसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता था क्योंकि पाँचवे और अंतिम दिन वर्षा के कारण एक गेंद भी नहीं फेंकी गई।


मैच बराबर रहा और ऑस्ट्रेलिया की शृंखला में 1-0 की बढ़त बनी रही। 13 विकेट लेने वाले अनिल कुंबले मैन ऑफ द मैच रहे।
भारतीय टीम यह सोचकर प्रसन्न हो सकती थी कि वीरेंद्र सेहवाग फॉर्म में लौटे थे। युवा बल्लेबाज मोहम्मफ कैफ और पार्थव पटेल ने भी अच्छे अर्धशतक बनाए थे। ऑस्ट्रेलिया के लिए शेन वॉर्न की गेंदबाजी और मार्टिन का शतक प्रसन्न करने वाली बात थी। भारतीय टीम के लिए कप्तान सौरव गांगुली, उपकप्तान राहुल द्रविड़ और VVS लक्ष्मण की फॉर्म चिंता का विषय थी।
ऑस्ट्रेलियाई कप्तान ऐडम गिलक्रिस्ट ने कहा कि यह तो सबको ज्ञात था कि WACA (पर्थ) में लम्बे समय तक खेल चुके मार्टिन तेज गेंदबाजी खेलने में दक्ष हैं पर इस वर्ष (2004) उन्होंने श्रीलंका में मुथैया मुरलीधरन एवं भारत में अनिल कुंबले और हरभजन के विरुद्ध शतक लगाकर यह सिद्ध कर दिया है कि वे एक पूर्ण बल्लेबाज हैं, स्पिन और पेस दोनों के विरुद्ध सिद्धहस्त।
नागपुर टेस्ट 8 दिन बाद आरम्भ होना था। इसकी चर्चा अगले भाग में।
साभार-
- 1993 से 2008 तक की ऑस्ट्रेलियाई टीम पर लिखी गयी Malcolm Knox की पुस्तक “The Greatest”
- यूट्यूब हाईलाइट्स
- ESPN CricInfo Scorecard
चित्र: Getty Images