2004: भारत में ऑस्ट्रेलिया की ऐतिहासिक टेस्ट शृंखला विजय- भाग 1

सिडनी 2004 महान स्टीव वॉ के करियर का अंतिम टेस्ट मैच था। अंतिम दिन वॉ की 80 रनों की पारी ने यह मैच ड्रॉ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बॉर्डर- गावस्कर शृंखला 1-1 की बराबरी पर समाप्त हुई। चूँकि भारत ने 2001 में हुई शृंखला 2-1 से जीती थी, अतः ट्रॉफी भारत के पास ही रही।

ऐलन बॉर्डर और मार्क टेलर की भाँति स्टीव भी अपने टेस्ट करियर का समापन अपनी शर्तों पर कर रहे थे। जैसे ही उन्हें लगा कि टीम उनके बिना आगे बढ़ सकती है और उनका रहना टीम की प्रगति में बाधक होगा, उन्होंने सन्यास लेना उचित समझा।

शीर्ष पर पहुँचना कठिन है पर उससे भी कठिन है शीर्ष पर बने रहना। एक टीम को सदैव प्रेरित रखने, उसकी विजय की भूख बनाए रखने के लिए जीतते रहना पर्याप्त नहीं है। रचनात्मक कप्तानी और नए विचारों का संचार होना आवश्यक है। स्टीव वॉ ने मार्क टेलर से एक सशक्त टीम प्राप्त की थी और इसे अपराजेय बना दिया था। उनके कार्यकाल में ऑस्ट्रेलिया ने टेस्ट मैच में एक दिन में 350 से अधिक रन लगातार बनाए (कुछेक अपवादों को छोड़कर), दो बार 400 से अधिक रन बनाए।

स्टीव वॉ ने इतिहास से सीखा था, उन्होंने महान खिलाड़ियों के सन्यास के उपरांत वेस्ट इंडीज़ की महान टीम का पतन होते देखा था, इसीलिए उन्होंने भविष्य पर भी ध्यान दिया था और लगातार आवश्यक परिवर्तन किए, नए खिलाड़ियों को अवसर दिए (*यह कप्तान का काम है। ऐसा करके वह किसी पर कृपा नहीं करता)। निश्चित रूप से वे भाग्यशाली भी रहे कि उनके पास योग्य खिलाड़ी आते रहे। एक कप्तान कितनी भी योजनाएँ बना ले, बिना सक्षम खिलाड़ियों के उन योजनाओं का सफल क्रियान्वयन सम्भव नहीं है।

ऑस्ट्रेलियाई मध्यक्रम 2001 की तुलना में पूरा बदला हुआ था। मार्क वॉ और स्टीव वॉ सन्यास ले चुके थे और रिकी पॉन्टिंग चोटिल थे। स्टीव वॉ के सन्यास के पश्चात डैरेन लीमन ऑस्ट्रेलियाई मध्यक्रम का हिस्सा बने हुए थे, वे स्टीव वॉ के नम्बर (5) पर खेल रहे थे और अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे। मार्च 2004 में श्रीलंका में हुई टेस्ट शृंखला में 2 शतक लगाए थे और कोलंबो में अंतिम टेस्ट जीतकर शृंखला 3-0 से जीतने में उनकी 153 रनों की पारी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी। अबतक 21 टेस्ट मैचों के करियर में उन्होंने 51.63 की औसत से डेढ़ हजार से अधिक रन बनाए थे। रिकी पॉन्टिंग की अनुपस्थिति में वे इस ऑस्ट्रेलियाई टीम के उपकप्तान बनाए गए थे।

साइमन कैटिच ने अबतक मात्र 9 टेस्ट मैच खेले थे। जिसमें से 4 भारत के विरुद्ध थे (भारत के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर)। सिडनी (स्टीव वॉ का अंतिम टेस्ट) में उन्होंने पहली पारी में शतक बनाया था और दूसरी पारी में उनके 77 अविजित रनों की पारी की मैच ड्रॉ कराने में महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। यही कारण था जुलाई 2004 में श्रीलंका के विरुद्ध हुई 2 टेस्ट की श्रृंखला में वे पूरी तरह विफल रहने पर भी चयनकर्ताओं ने भारत दौरे के लिए उन्हें टीम में चुना। (2004 में ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका के मध्य 5 टेस्ट हुए थे, 3 श्रीलंका में मार्च में और 2 ऑस्ट्रेलिया में जुलाई में)

डेमियन मार्टिन 2001 ऐशेज शृंखला से ऑस्ट्रेलियाई टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए थे। मार्क वॉ के सन्यास के बाद उन्हें मार्क वॉ के नम्बर (4) पर खेलने का अवसर मिला। मार्क की तरह ही वे एक दर्शनीय बल्लेबाज थे। श्रीलंका में हुई शृंखला में उन्होंने 2 शतक लगाए थे, जिसमें से कैंडी में दूसरे टेस्ट की दूसरी पारी में लगाया गया उनका शतक (161) उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ पारियों में से एक रहा। रिकी पॉन्टिंग की अनुपस्थिति में अनिल कुम्बले और हरभजन सिंह के विरुद्ध ऑस्ट्रेलियाई मध्यक्रम को संभालने का दायित्व उनपर ही था। मार्टिन ने कह दिया था कि हाफ़ वॉली के अतिरिक्त स्पिन गेंदबाजों की गेंदों को वे बैकफुट पर ही खेलेंगे। श्रीलंका में उन्होंने यही किया था। मुरलीधरन और उपुल चंदना को उन्होंने जिस कौशल से खेला था, वह अद्भुत था।

Kid from Western Suburbs of Sydney: ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट के “Next big thing” कहे जा रहे 23 वर्षीय माइकल जॉन क्लार्क का नाम भारतीय क्रिकेट टीम ने लिए अनसुना नहीं था। क्लार्क ने अबतक 34 एकदिवसीय मैच खेले थे और 41 की औसत से 900 रन बना चुके थे। उन्होंने 2003 में भारत में हुई एकदिवसीय त्रिकोणीय शृंखला भी खेली थी। भारतीय टीम जब ऑस्ट्रेलिया दौरे पर गयी थी तो तीन दिवसीय दिवसीय अभ्यास मैच में ऑस्ट्रेलिया- “ए” के लिए खेलते हुए क्लार्क ने 131 अविजित रन (मात्र 140 गेंदों में) बनाए थे।

2004 के भारत दौरे के लिए जब माइकल क्लार्क का ऑस्ट्रेलियाई टीम में चयन हुआ तब आशा यही की गई थी कि वे टेस्ट टीम के साथ रहकर अनुभव प्राप्त करेंगे। इस टेस्ट शृंखला से ठीक पूर्व इंग्लैंड में हुई ICC चैंपियंस ट्रॉफी में कप्तान रिकी पॉन्टिंग के अंगूठे में चोट लग गयी और बैंगलोर में प्रथम टेस्ट की एकादश में माइकल क्लार्क को स्थान मिलने की पूरी संभावना बन गयी।

क्लार्क की प्रथम श्रेणी औसत 40 से कम थी, इस कारण उनके चयन पर आलोचनाओं के स्वर मुखर हुए। विक्टोरिया के ब्रैड हॉज को भी टीम में सम्मिलित किया गया था और यह चर्चाएँ भी थीं कि वे पॉन्टिंग के स्थान पर नम्बर 3 पर खेल सकते हैं। ब्रेबोर्न स्टेडियम में मुंबई के विरुद्ध अभ्यास मैच में माइकल क्लार्क ने 52 रनों की पारी खेली और टीम प्रबंधन ने निर्णय लिया कि बैंगलोर में प्रथम टेस्ट में क्लार्क ही एकादश का हिस्सा होंगे। टीम प्रबंधन को अब यह विचार करना था कि नम्बर 3 (पॉन्टिंग का नम्बर) पर कौन खेलेगा, क्लार्क में क्षमता तो थी परंतु उनके पहले ही टेस्ट में उन्हें नम्बर 3 पर भेजना कप्तान और कोच को उचित नहीं लगा। निर्णय यह हुआ कि माइकल क्लार्क 6 पर खेलेंगे और साइमन कैटिच नम्बर 3 पर।

ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी क्रम में अन्य तीन प्रमुख नाम थे, आरंभिक बल्लेबाज जस्टिन लैंगर और मैथ्यू हेडन और विकेटकीपर बल्लेबाज कार्यवाहक कप्तान ऐडम गिलक्रिस्ट।

ऑस्ट्रेलियाई टीम ने भारत में दो स्पिनर एकादश में रखने के स्थान पर इस बार अपनी ताकत अर्थात तेज गेंदबाजी को ही सशक्त रखने की योजना बनाई थी। ग्लेन मक्ग्रा और जेसन गिलेस्पी के साथ तीसरे तेज गेंदबाज थे माइकल कैस्प्रोविच, जिन्हें टीम प्रबंधन ने भारतीय परिस्थितियों हेतु ब्रेट ली से बेहतर समझा था। स्पिन का भार शेन वॉर्न के ऊपर, जिन्होंने एक वर्ष का प्रतिबंध पूरा करने के बाद श्रीलंका में हुई शृंखला में 20 की औसत से 26 विकेट लिए थे। भारत में अभी तक शेन वॉर्न को कोई विशेष सफलता नहीं मिली थी और यह निश्चित रूप से भारत में उनकी अंतिम टेस्ट शृंखला थी।

ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाजों की लाइन सामान्यतया चौथे और पाँचवे स्टंप पर होती है ताकि बल्लेबाजी को विकेट के पीछे कैच कराया जा सके, पर ऐसा करने से बोल्ड और एलबीडबल्यू की संभावनाएं अल्प हो जाती हैं। अतः भारत दौरे पर उन्होंने तय किया था कि लेग साइड में अतिरिक्त क्षेत्ररक्षक रखकर विकेट टू विकेट गेंदबाजी की जाए। भारतीय बल्लेबाज अपने पैरों पर की गई गेंदों को अच्छा खेलते हैं पर इन शॉट्स पर उन्हें रन न मिले तो वो कुछ अतिरिक्त करने का प्रयास करेंगे और आउट होने की संभावना बढ़ेगी।

6 अक्टूबर 2004: चिन्नास्वामी स्टेडियम, बैंगलोर में ऐडम गिलक्रिस्ट ने टॉस जीता और किसी को कोई संदेह नहीं था कि वे क्या करने वाले हैं। जस्टिन लैंगर स्ट्राइक पर। इरफान पठान की पहली गेंद अंदर आई और लैंगर के पैड पर लगी। बहुत जोर की अपील परंतु अम्पायर बिली बाउडेन की उंगली नहीं उठी।

हेडन बिल्कुल 2001 वाली लय में ही दिख रहे थे। उन्होंने लैंगर के साथ 50 रनों की साझेदारी कर ली थी। कप्तान सौरव गांगुली ने हरभजन सिंह को आक्रमण पर लगाया, स्क्वेयर लेग सीमारेखा से थोड़ा अंदर युवराज सिंह को खड़ा करके। हेडन स्लॉग स्वीप के लिए गए, बल्ले और गेंद का सम्पर्क ठीक नहीं और गेंद युवराज सिंह के हाथों में। हेडन के विकेट के बाद लैंगर और कैटिच के बीच एक और साझेदारी पनपी और स्कोर 100 के पार हो गया। लैंगर ने अपना 21वाँ अर्धशतक पूरा किया और उसके बाद इरफान पठान की गेंद पर बोल्ड हो गए। अनिल कुंबले ने डेमियन मार्टिन को फॉरवर्ड शॉर्ट लेग और लीमन को पहली स्लिप में कैच कराया और 399 टेस्ट विकेट तक जा पहुँचे।

माइकल क्लार्क ने आज सवेरे शेन वॉर्न के हाथों अपनी “बैगी ग्रीन कैप” प्राप्त की थी। जब वे क्रीज पर आए तो स्कोर था 149 रन पर चार विकेट। अनिल कुंबले अपने 400वें विकेट की खोज में। पूरा स्टेडियम उनके साथ। टेस्ट क्रिकेट में क्लार्क पहली गेंद खेलने को तैयार। कुंबले की गूगली, सीधे पैड पर, तेज अपील परंतु नो-बॉल का संकेत।

अपना पहला रन लेने के बाद माइकल क्लार्क को बहुत समय नहीं लगा रंग में आने में। वे टेस्ट क्रिकेट के लिए पूर्ण रूप से तैयार थे। उनका फुटवर्क उच्चस्तरीय और दुविधा-मुक्त था। शॉर्टपिच गेंदों पर वे पूरी तरह बैकफुट पर जाकर पुल और कट रहे थे। आगे फेंकी गई गेंदों पर वे आगे निकलकर कवर की दिशा में ड्राइव कर रहे थे। ऐसा बिल्कुल नहीं लग रहा था कि यह बल्लेबाज अपना पहला टेस्ट खेल रहा है। जब भी उनके बल्ले का संपर्क गेंद से हो रहा था, ऑस्ट्रेलियाई समर्थकों के लिए वह ध्वनि कर्णप्रिय थी। क्लार्क ने अपना अर्धशतक 99 गेंदों पूरा कर लिया था।

“Breath of fresh air”
80वें ओवर में अनिल कुंबले की पहली गेंद। अराउंड द विकेट से, लेग स्टम्प के काफी बाहर पिच हुई, माइकल क्लार्क ने आगे निकलकर गेंद को सीधा उठा दिया। कॉमेंट्री बॉक्स में डीन जोन्स के शब्द “Oh.. is he a breath of fresh air!”

Number 400 for the great man: अनिल कुंबले अराउंड द विकेट से शॉर्ट गेंद। चौका या छक्का डिजर्व करती हुई। कैटिच ने बिल्कुल यही करने का प्रयास किया। बैकफुट पर जाकर पुल करने का प्रयास, गेंद हैंडल से लगकर उनके थाई-पैड पर गिरी और उसके बाद गिल्ली पर। अनिल कुंबले के चार सौ विकेट पूरे। टेस्ट क्रिकेट में 400 विकेट पूरे करने वाले तीसरे स्पिनर और दूसरे भारतीय गेंदबाज बन गए। कैटिच ने 81 रनों की अति-महत्वपूर्ण पारी खेली थी।

Unstoppable Gilchrist: साइमन कैटिच के आउट होने के पश्चात क्रीज पर आए ऐडम गिलक्रिस्ट ने हरभजन सिंह को चौका लगाकर अपना खाता खोला और दिन का खेल समाप्त होने तक क्लार्क के साथ मिलकर स्कोर को 90 ओवर में 5 विकेट पर 316 तक पहुँचा दिया। क्लार्क 76 और गिलक्रिस्ट 35 पर खेल रहे थे। आज का दिन पूर्ण रूप से ऑस्ट्रेलिया के नाम रहा था। भारत के लिए एकमात्र प्रसन्न होने वाली बात यही थी कि कुंबले के 400 विकेट पूरे हो गए थे।

दूसरे दिन सवेरे आते ही गिलक्रिस्ट ने आक्रमण कर दिया। दिन के 5वें ओवर में उन्होंने इरफान को दो चौके लगाए और 7वें ओवर में अनिल कुंबले की गेंद को आगे निकलकर मिड ऑन के ऊपर से दर्शक दीर्घा में भेज दिया। यह ऐडम गिलक्रिस्ट का 18वाँ अर्धशतक था।

Baggy Green:
दूसरी ओर माइकल क्लार्क 98 पर आ चुके थे। इरफान पठान गेंदबाजी कर रहे थे और उन दिनों उनकी गति ठीक ठाक थी, पर माइकल क्लार्क ने ड्रेसिंग रूम से “बैगी ग्रीन कैप” मंगाई। वे अपना शतक बैगी ग्रीन पहने हुए पूरा करना चाहते थे। यदि स्टीव वॉ से उन्होंने परामर्श लिया होता तो वे बिल्कुल सहमत होते। इरफान की गेंद को उन्होंने मिडविकेट पर खेला और दो रन के लिए भागे। उन्होंने अपनी बैगी ग्रीन को चूमा, बल्ले को चूमा, अवसर मिलता तो इस समय वे ऐडम गिलक्रिस्ट को भी चूम लेते। दर्शक दीर्घा में उनकी माता की आँखों में हर्ष के अश्रु और मुख पर मुस्कान। 1995 में ग्रेग ब्लूवेट के बाद अपने पदार्पण मैच में शतक बनाने वाले पहले ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज थे माइकल क्लार्क।

Century for the Skipper:
भोजनावकाश से कुछ मिनट पूर्व गिलक्रिस्ट ने कुंबले को चौका लगाकर अपना 11वाँ टेस्ट शतक पूर्ण किया। 3 ओवर बाद जब उन्होंने हरभजन सिंह को रिटर्न कैच थमाया तब ऑस्ट्रेलिया का स्कोर हो चुका था 423 रन 6 विकेट पर। गिलक्रिस्ट ने मात्र 109 गेंदों में 104 रन बनाए थे।

दूसरे सत्र में ऑस्ट्रेलिया ने एक घण्टे बल्लेबाजी की और 51 रन जोड़े, जिसमें से 40 रन माइकल क्लार्क के थे। क्लार्क ने अनिल कुंबले के एक ओवर में दो चौके और एक छक्का लगाया, कुंबले के अगले ओवर की पहली ही गेंद पर उन्होंने फिर छक्का लगाया। अपना मैच खेल रहा एक बल्लेबाज अनिल कुंबले को उनके घर में डॉमिनेट कर रहा था। ऐसा कदाचित ही कभी देखा गया था। क्लार्क ने अपनी पारी 151 पर समाप्त की और ऑस्ट्रेलिया की पारी 474 पर समाप्त हुई।

ऑस्ट्रेलियन समाचारपत्र क्लार्क की चर्चा से भरे पड़े थे। कोई उनके पदार्पण की तुलना डग वॉल्टर्स से कर रहा था। कोई उनके खेल की तुलना मार्क वॉ से तो कोई ग्रेग चैपल से कर रहा था। एक बात स्पष्ट थी कि ऑस्ट्रेलिया को भविष्य का सुपरस्टार मिल गया था।

Glenn McGrath:
भारतीय टीम ने इसी वर्ष जनवरी में जब ऑस्ट्रेलिया में शृंखला 1-1 से बराबर की थी तब ग्लेन मक्ग्रा ऑस्ट्रेलियाई टीम का हिस्सा नहीं थे। बैंगलोर में उन्होंने पहले ही ओवर में आकाश चोपड़ा को शून्य पर आउट किया और अगले ओवर में टेस्ट रैंकिंग में नम्बर 1 पर विराजमान और “आईसीसीसी क्रिकेटर ऑफ द यर” राहुल द्रविड़ को शून्य पर बोल्ड करके इस मैच में भारतीय टीम की संभावनाओं पर कुठाराघात कर दिया।

Will the skipper stand up?
राहुल द्रविड़ पवेलियन लौट चुके थे, सचिन तेंदुलकर टेनिस एल्बो इंजरी के कारण टीम से बाहर थे। ऐसे में टीम को मुश्किल से निकालने का दायित्व कप्तान सौरव गांगुली पर था। ऑस्ट्रेलियाई कार्यवाहक कप्तान ऐडम गिलक्रिस्ट ने शतक बनाकर एक उदाहरण प्रस्तुत किया था। क्या सौरव भी ऐसा कर सकते थे?

सौरव ने आरम्भ तो अच्छा किया और सेहवाग के साथ मिलकर स्कोर को 50 के पार पहुँचाया। ऑस्ट्रेलिया के विशाल स्कोर के समीप पहुँचने हेतु एक लंबी साझेदारी की आवश्यकता थी परंतु माइकल कैस्प्रोविच ने एक ही स्पेल में सेहवाग को 39 और गांगुली को 45 पर आउट करके मैच पर ऑस्ट्रेलियाई पकड़ और दृढ़ कर दी।

अनुभवहीन युवा बल्लेबाजों और ग्लेन मक्ग्रा के बीच कोई मुकाबला होता नहीं था और युवराज सिंह कोई अपवाद नहीं थे। मक्ग्रा ने उन्हें मात्र 5 रन पर आउट किया।

अब बारी “किंग ऑफ स्पिन” की थी। शेन वॉर्न की गेंद लेग स्टम्प की लाइन में गिरी और रक्षात्मक ढंग से खेलने का प्रयास करके लक्ष्मण के बल्ले को ताकती हुई ऑफ स्टम्प पर लगी। कुछ क्षणों के लिए माइक गैटिंग वाली गेंद की यादें ताजा हो गयी थीं। भारत का स्कोर 136 पर 6, ऑस्ट्रेलिया से 338 रन पीछे। पार्थिव पटेल, इरफान पठान और अनिल कुंबले के छोटे छोटे योगदानों ने टीम को 246 रन तक पहुँचाया। पार्थिव ने टीम के लिए सर्वाधिक 46 रन बनाए।

228 रनों की बढ़त के बाद ऑस्ट्रेलिया ने फॉलो-ऑन नहीं दिया क्योंकि ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज 89 ओवर गेंदबाजी कर चुके थे और उन्हें विश्राम की आवश्यकता थी और कहीं न कहीं कोलकाता 2001 की यादें अभी धूमिल नहीं हुई थीं।

Australia in commanding position:
तीसरे दिन की संध्या तक ऑस्ट्रेलिया का स्कोर था 127 रन पर 4 विकेट, बढ़त 355 रनों की। मार्टिन और क्लार्क दोनों खेल रहे थे। ऑस्ट्रेलिया को दूसरी पारी में अपने किसी बल्लेबाज से विशाल स्कोर की आवश्यकता नहीं थी। छोटे छोटे योगदानों से भी टीम का काम हो जाना था। ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों ने यही किया। हेडन ने 30, कैटिच ने 39, मार्टिन ने 45, गिलक्रिस्ट ने 26 और वॉर्न ने 31 रन बनाकर भारत के सामने चौथी पारी में 457 रनों का लक्ष्य रखा।

अभी 5 सत्र का खेल शेष था। ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों को पर्याप्त विश्राम मिल चुका था और उन्होंने ऑस्ट्रेलिया को 1-0 की बढ़त की ओर पहुँचाने में तनिक भी विलंब नहीं किया। 12वें ओवर में ही मात्र 19 के स्कोर पर भारत के 4 विकेट गिर गए थे। चौथे दिन का खेल समाप्त होने तक भारतीय टीम ने 6 विकेट पर 105 रन बनाए थे। उपकप्तान राहुल द्रविड़ 47 पर खेल रहे थे पर यह स्पष्ट था कि उनकी यह पारी ऑस्ट्रेलिया की विजय में थोड़ा विलम्ब अवश्य पैदा कर सकती थी पर उसे रोक नहीं सकती थी। 5वें और अंतिम दिन यही हुआ। अगले दिन राहुल द्रविड़ के बाद जब अनिल कुंबले आउट हुए तब स्कोर था 125 पर 8. इरफान पठान और हरभजन के बीच 89 रनों की साझेदारी बस भारत की पराजय का अंतर कम किया।

गिलेस्पी की शॉर्ट गेंद पर ग्लेन मक्ग्रा ने डीप फ़ाईन लेग पर हरभजन का कैच पकड़ा और ऑस्ट्रेलिया ने यह मैच 217 रनों से जीत लिया। माइकल क्लार्क मैन ऑफ द मैच चुने गए थे। ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाजों ने 20 में से 15 विकेट लिए थे। शेन वॉर्न ने सहायक की भूमिका अच्छी निभाई थी। भारतीय टीम प्रबंधन को दूसरे टेस्ट से पहले कई बिंदुओं पर सोच विचार करना था।

साभार-

  1. 1993 से 2008 तक की ऑस्ट्रेलियाई टीम पर लिखी गयी Malcolm Knox की पुस्तक “The Greatest”
  2. ESPN CricInfo पर सिद्धार्थ वैद्यनाथन का लेख “Once upon a twinkle-toed debut”
  3. The Age में छपा लेख “Nervous Clarke awaits test debut.”

चित्र: Getty Images

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